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BHONSLE MOVIE REVIEW, भोंसले फ़िल्म समीक्षा

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कुछ विभाजनकारी मूर्ख अभी भी स्वयं को ऊँची बुद्धि, जाति , क्षेत्र , संप्रदाय , वंश आदि का व अन्य को  बेकार या कमतर मानते हैं। ये वही लोग हैं जो भारत की प्राचीन कर्म आधारित व्यवस्था को जन्म  आधारित समझ लिये। अच्छी बात ये है कि ऐसे लोग खत्म हो रहे हैं। कुछ ऐसे विभाजनकारी मूर्ख भी  पैदा हो रहें है जो अभिव्यक्ति की आज़ादी का दुरुपयोग कर किसी भी कुकृत्य के लिए या अपना  भड़ास निकालने के लिए या कुंठाग्रस्त होकर पूरे एक वर्ग को अनाप शनाप कह रहें है। इस प्रकार के लोग समाज को सुधरने ही नहीं देना चाहते। चर्चित शब्द “नेपोटिज्म(भाई-भतीजावाद/वंशवाद )  विस्तारित , विकृत , और सामूहिक या क्षेत्रीय होकर जातिवाद , क्षेत्रवाद , संप्रदायवाद , भाषावाद आदि का  घिनौना रूप ले लेता है। भोंसले फ़िल्म में क्षेत्रवाद व भाषावाद का मुद्दा उठाया गया है। फिल्म गणपति बप्पा के साज- श्रृंगार व भोंसले(मनोज वाजपायी) की वर्दी उतारने(अंतिम दिन/रिटायरमेंट) के समानांतर दृश्य से प्रारंभ होता है इधर श्रृंगार बढ़ता जाता है उधर वर्दी उतरती जाती है।   भारत में बप्पा सबसे ज्यादा रूप व वेशभूषा धारण कर...