BHONSLE MOVIE REVIEW, भोंसले फ़िल्म समीक्षा
कुछ विभाजनकारी मूर्ख अभी भी स्वयं को ऊँची बुद्धि, जाति, क्षेत्र,संप्रदाय,वंश आदि का व अन्य को बेकार या कमतर मानते हैं। ये वही लोग हैं जो भारत की प्राचीन कर्म आधारित व्यवस्था को जन्म आधारित समझ लिये। अच्छी बात ये है कि ऐसे लोग खत्म हो रहे हैं। कुछ ऐसे विभाजनकारी मूर्ख भी पैदा हो रहें है जो अभिव्यक्ति की आज़ादी का दुरुपयोग कर किसी भी कुकृत्य के लिए या अपना भड़ास निकालने के लिए या कुंठाग्रस्त होकर पूरे एक वर्ग को अनाप शनाप कह रहें है। इस प्रकार केलोग समाज को सुधरने ही नहीं देना चाहते। चर्चित शब्द “नेपोटिज्म(भाई-भतीजावाद/वंशवाद) विस्तारित,विकृत,और सामूहिक या क्षेत्रीय होकर जातिवाद,क्षेत्रवाद,संप्रदायवाद,भाषावाद आदि का घिनौना रूप ले लेता है। भोंसले फ़िल्म में क्षेत्रवाद व भाषावाद का मुद्दा उठाया गया है।
फिल्म गणपति बप्पा के साज-श्रृंगार व भोंसले(मनोज वाजपायी) की वर्दी उतारने(अंतिम दिन/रिटायरमेंट) के समानांतर दृश्य से प्रारंभ होता है इधर श्रृंगार बढ़ता जाता है उधर वर्दी उतरती जाती है।
भारत में बप्पा सबसे ज्यादा रूप व वेशभूषा धारण करने वाले देव हैं जिन्हें बच्चे-बूढ़े सभी अपना मित्र सम देवता मानते हैं। बप्पा कभी आर्मी पोशाक, कभी स्पाइडरमैन,कभी सूमो पहलवान,स्थानीय वेशभूषा या वर्तमान मे प्रचलित शैली(स्टाइल), रुझान (ट्रेंड), प्रसिद्ध घटना,व्यक्ति, फिल्मी पात्र के आधार पर अलग-अलग रूपों में विराजते हैं। कभी-कभी यह अतिरूप चित्रण (एग्जाजेरेशन),अभद्र भी हो जाता है।मूर्तिकार और स्थापक दोनों को मूर्ति को देवत्व देना चाहिए। खैर, बप्पा इन 10 दिनों में मित्रवत अतिथिदेव के रूप में प्रत्येक व्यक्ति के मन के अनुरूप विराजते हैं। भारत में ही यह महान उदारवादी संस्कृति आज तक जिंदा है कि ईश्वर/देव/भगवान/गॉड हमने ही बनाया है। हमारे द्वारा निर्मित हमारी मुक्ति के लिए, उत्सव,उल्लास, परमानंद, आत्मज्ञान प्राप्त करने का एक साधन, एक यंत्र है। हम जैसा चाहते हैं जिसे चाहते हैं भगवान बना सकते हैं अपने सहारे के लिए अपनी मुक्ति के लिए क्योंकि ऊपरवाला या ऊपर में कोई नहीं होता। सृष्टि का जो भी स्त्रोत है सृष्टि के कण कण मे है और इस प्रकार वही स्त्रोत हम सब के भीतर मे भी है। वेदान्त दर्शन में भी परमब्रह्म/परम स्त्रोत/ईश्वर को निराकार ही कहा गया है। और जो निराकार हो उसे हम किसी भी रूप में प्रदर्शित कर सकतें हैं।हर व्यक्ति अपने समझ के अनुसार किसी में या बहुतों में ईश्वर की झलक देख सकता है। इसलिए बहुत सारे देवी देवताओं का विभिन्न रूपों में होना बिल्कुल ठीक है।
सनातन संस्कृति में आप अपने घर में मंदिर बनाकर उसका पुजारी बन सकते हैं। आपको जिस भी किसी व्यक्ति, वस्तु में ईश्वरीय झलक मिले आप उसकी मूर्ति बनाकर या जीवित रूप में पूजा शुरू कर सकते हैं कहीं कोई भी सनातनी इसे बुरा नहीं कहेगा।
जो भी असाधारण मानवीय क्षमता का प्रदर्शन करता है हमारे लिए पूज्य देवता हो जाता है या उसे हम ईश्वरीय अवतार कहते हैं क्योंकि उस व्यक्ति, जीव,वस्तु में हम उस परम स्त्रोत का झलक पाते हैं। यही चीर स्थाई सत्य भी है जिसे सनातन संस्कृति ने बहुत पहले जान लिया था। अगर हम भारत में जन्मे या कहें अवतरित हुए हमारे पूर्वज शिव, राम, कृष्ण,बुद्ध, गुरु नानक, महावीर स्वामी, शंकराचार्य, चैतन्य महाप्रभु,संत कबीर,दादू दयाल, छत्तीसगढ़ में गुरु घासीदास आदि अनेक ऋषि मुनियों के जीवन चरित्र को देखें तो ये सभी एक मानव के रूप मे जन्में-राजा /व्यापारी/ जुलाहा आदि थे। परंतु जैसे ही इन्हें आत्मज्ञान प्राप्त हुआ/इन्होनेअसाधारण क्षमता का प्रदर्शन किया या व्यापक जन कल्याण का कार्य किया हम इन्हें पूजने लगे। इनके द्वारा जीवन मुक्ति के बताए गए मार्ग, कर्म,आचरण पर अनुयायी चलने लगे और आज हम इन्हें ईश्वर या ईश्वर का दूत कहकर पूजते हैं। आप खुद सोचिए,चिंतन कीजिए।
हम अपने जीवनकाल में ही असाधारण सद कार्य कर देव बन सकते हैं और स्वर्ग भोग सकते हैं या बुरे कार्य कर शैतान बनकर नर्क भोग सकते हैं।सनातन संस्कृति में हमेशा कहा गया है जैसी जिसकी आस्था वैसा मुक्ति का मार्ग।इसीलिए सनातनी संस्कृति अनेक देवी-देवताओं की पूजा करती है इस संस्कृति ने ईश्वर नहीं है कहने वालों को भी पूजा है।हर प्राचीन संस्कृति की तरह इसमें भी कुरीतियाँ,आडंबर आए,धर्म के नाम पर शोषण हुए परंतु ये शोषण व अत्याचार एक सामाजिक बुराई थी जिसे घृणित मानसिकता वाले लोगों ने किया किसी भी महापुरुष, पूज्य पुरुष ने ऐसा करने नहीं कहा। वैसे भी जो जितना पुराना उतना ही ज्यादा उसमें जालें।बाद में समाज सुधार के कई आंदोलन भी चले।परंतु अब लोकतन्त्र है,व्यक्तिगत स्वतन्त्रता का अधिकार है। आपको जो मानना है मानिए, बस किसी और के भावनाओं को ठेस मत पहुंचाइए।
सिर्फ मेरा ही मार्ग सही या मेरी ही आस्था सही है की भावना कट्टरता व हिंसा को जन्म देकर समाज में विभाजन पैदा करती है।
फिल्म में क्षेत्रवाद,राजनीति तथा आम मानवीय संवेदना/गुण को एक चाल(मुंबई में किराए देने के लिए बनाए गए छोटे-छोटे कमरों के बहुमंजिला इमारत) के माध्यम से दिखाया गया है। एक पक्ष मराठी मानुष का दूसरा पक्ष उत्तर भारतीय(भैया जी), तीसरा पक्ष भोंसले बाँकी इनके इर्द-गिर्द।
विलास (संतोष जुवेकर) चाल में मराठी मानुष का राग अलाप कर समर्थन जुटाने वाला कठपुतली नेता है।ये बोलता है-सिर्फ मराठी मानुष का गणपति बैठेगा इधर। राजेंद्र(अभिषेक बैनर्जी) उत्तर भारतीय संघ बनाकर अलग गणपति बैठाना चाहता है जो 25 सालों में कभी नहीं हुआ। इसी बात पर, विलास, राजेंद्र को पीटकर गर्व अनुभूति की नाद करता है। विलास का आका भाऊ उसे मराठी मानुष के मंत्र के सहारे परिपक्व राजनीति कर लोगों के नजर में आने कहता है। हमारे देश और कई देशों में राजनैतिक महत्वाकांक्षा वाला अधिकांश व्यक्ति अपने जाति, क्षेत्र, संप्रदाय, भाषा को नींव बनाकर समर्थन के ईंटें रखता है दूसरों के प्रति द्वेष भाव का गारा(Slurry) बनाकर जोड़ता है। इस तरह वह अपने लिए एक अभेद्य राजनैतिक किला बना लेता है। अभी कुछ दिन पूर्व दक्षिण के एक प्रसिद्ध फिल्म अभिनेता राजनीति में उतरे और समर्थन जुटाने हिंदी विरोध में अनाप-शनाप बक गए जिसे लिखना उचित नहीं लगता (संकेत-“एक दूजे के लिए है”)। जो भी नया दल बनाता है वह अपने आपको किसी जाति या वर्ग का सबसे बड़ा हितैषी साबित कर दूसरे जाति/वर्ग को गाली देता है ताकि एकमुश्त वोट मिले और देश में विभाजन पैदा करता है। चर्चिल चाल के मुख्य द्वार के सुरंग में वाचनालय है जहां पर मराठी मोर्चा और चर्चिल मित्र मंडल लिखा हुआ है। आशय है हम विदेशियों के शासन, भाषा, व्यवहार, संस्कृति को धर्मनिरपेक्ष,पंथनिरपेक्ष और महान मानकर एकमत होकर अपना लेते हैं परंतु अपने देश की विविधता का हम विरोध या अपमान करते हैं। चर्चिल वही आदमी है जिसने ‘महात्मा गांधी’ को ‘अर्धनग्न फकीर’ कहा था! लानत है, हम सब पर। फिल्म मे सभी पक्ष मिल बैठकर आसानी से शांतिपूर्ण रास्ता निकाल सकते थे। देश में करोड़ो लोग रोज़गार व अन्य कारणों से एक राज्य से दूसरे राज्य जाते हैं, बस जाते हैं जो उनका मौलिक अधिकार है। कुछ स्थानों पर एक पक्ष दूसरे पक्ष पर धौंस जमाता है, कमतर समझता है,हक़ मारता है और यहीं से टकराव का प्रारम्भ होता है। विलास सवारी वाहन चालक है परंतु नेता बनना चाहता है। अपने चेलों(दो छोटे बच्चों) और चालवालों के सामने मराठी मानुष की रट लगाए रहता है और डींगे हाँकता है कि वो भाऊ का खास आदमी है जबकि भाऊ उसे गधा ही समझते हैं।हर छुटभैय्ये नेता का विलास जैसा ही हाल है। भोंसले बिलकुल शांतचित्त,सादगीपूर्ण,बेहद कम बोलने पुलिस विभाग के छोटे पद से सेवानिवृत्त कर्मचारी है जो अपने सेवा विस्तार के लंबित(Pending) फ़ाइल की तरह बस चाल के हर हलचल,वार्तालाप,घटना को देखता है। उसने तो चाल मे नई आई सीता(इप्शिता चक्रवर्ती सिंह) और उसके भाई लालू(विराट वैभव) के नमस्ते का जवाब भी नहीं दिया ना ही विलास के समर्थन मांगने का। सीलन भरा कमरा, टपकती छत,मात्र सफ़ेद कुर्ता-पैजमा,पुराना रेडियो,दाल-रोटी,चाय-ब्रेड,खुद कपड़े धोना,पोछा लगाना इस बात के परिचायक थे की वे सदैव ईमानदार रहे जिनकी सभी इज्जत करते हैं। एक दिन भोंसले स्वप्न देखते हैं कि वे इसी कमरे मे रोज़ एक ही दिनचर्या मे बूढ़े होकर मर गए। इस स्वप्न दृश्य का फिल्मांकन प्रभावकारी है। जिसके एक दृश्य मे भोंसले इतने जर्जर हो चुके हैं कि अपनी पुरानी सीटी मे फूँक भी नहीं मार पा रहे। जब विलास कहता है भोंसले काका आप हमारा साथ दो , मराठी मानुष का......बस आप हुकुम करो...क्या करना है तो भोंसले-“बहुत दिन से ये(नाली/गटर) खुला है कुछ कर” कहकर चले जाते हैं। विलास कहता है मैं है न,मैं सब करेगा। इस पर आसपास खड़े बुजुर्ग भी कहने लगते हैं ‘पिछले महीने इसी के कारण डेंगू हुआ था” “मेरे घर मे बहुत चूहे हैं” तो विलास कहता है उसको आप साफ करो मैं मराठी मानुष के लिए करेगा।ऐसे ही कुछ लोग अपने जाति, पंथ,क्षेत्र आदि का नाम लिखकर सोशल मीडिया मे हुंकार भरते हैं कि वे शेर हैं बाँकी उनके सामने कुछ नहीं। ऐसे लोगों को हमारे एक मित्र का जवाब है- “भारतीय सेना मे और बाहर भी हर जाति, संप्रदाय, क्षेत्र के जो लोग भी देश के लिए अपना बलिदान देने तत्पर हैं वे सभी शेर हैं। अगर तुम इतने ही बड़े शेरदिल हो तो दुश्मन देश मे जाकर अपना करतब दिखाओ”। राजेंद्र, लालू का मुंडन करवा उत्तर भारतीय संघ में शामिल कर लेता है और रात मे मारपीटकर मराठी मोर्चा लिखे हुए दीवार पर काला पेंट फेंकवाता है। सीता अपने भाई की करतूत भोंसले को बताती है तो वे कोई उग्र प्रतिक्रिया नहीं देते और बाद मे लालू के साथ मिलकर रात मे बिना किसी को बताए नया पेंट करते हैं। इस तरह भोंसले एक आम आदर्श परिपक्व भारतीय का परिचायक है जो हर पक्ष के उग्र/चरमपंथियों की करतूत पर उग्र प्रतिक्रिया न देकर समन्वय का प्रयास करता है। परंतु आदर्श आदमी का भी धैर्य टूटता है जैसे फिल्म के उत्कर्ष(Climax) में ब्रेन ट्यूमर(फोड़ा/अर्बुद) ग्रस्त भोंसले विघ्नहर्ता बनते हैं। पूरे फिल्म मे कुत्ता,कौआ,बिल्ली,चूहा सह पत्रों की तरह फिल्माए गए हैं। इप्शिता थिएटर से फिल्मों मे आयी हैं और एक उत्तर भारतीय प्रवासी नर्स के रूप मे बेजोड़ अभिनय की हैं। दो बार के राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता मनोज वाजपायी हमेशा की तरह शानदार हैं। फिल्म मे कम से कम संवाद है।भोंसले का मूल मंत्र बातों से नहीं, कर्म से आदर्श स्थापन है। आइये हम सब मिलकर क्षेत्रवाद, जातिवाद, संप्रदायवाद, भाषावाद आदि सभी वाद को मन, वचन,कर्म से खत्म करने का संकल्प करें।समन्वय का प्रयास करें। इंटरनेट, सोश्ल मीडिया में आजकल हर गलत और सही बात के समर्थन और विरोध में सैकड़ों पेज,साइट,चैनल आदि उपलब्ध हैं,इन पर अंधविश्वास न करके स्तरीय पुस्तकों,आधिकारिक सूचनाओं का अध्ययन करें।फ़िल्म का अंतिम दृश्य पुनः समानांतर हो जाता है, जिसमे भोंसले और बप्पा की मूर्ति विघ्न नाश कर बस पड़े रहते हैं।
**पुरोनी(छत्तिसगढ़ी शब्द/Extra Notes )-युवा और काबिल निर्देशक देवाशीष मखीजा के इस फिल्म
का फ़र्स्ट लुक 2018 के Cannes फिल्म महोत्सव में जारी हुआ था। 2018 मे ही बुसान
अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव में प्रथम बार प्रदर्शित हुआ। 2019 में बार्सिलोना
में आयोजित एशियन फ़िल्म महोत्सव में सर्वश्रेष्ठ पटकथा व निर्देशक का पुरस्कार
प्राप्त हुआ। Sony LIV पर 26
जून 2020 से प्रसारित है।
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Very good review 👍👍👍
ReplyDeleteTHANKS
DeleteReally good review as always.
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