विभाजनकारी Vs समन्वयवादी पार्ट- 2


*वर्तमान में जो भी पढ़ा लिखा या अनपढ़ जीव अथवा जीव समूह भारत भूमि में प्राचीन काल या बाद में जन्में फले फूले धर्म, पंथ, समुदाय को आपस में विरोधी बता कर मैं श्रेष्ठ मैं श्रेष्ठ का प्रलाप करेगा उसे विभाजनकारी ही मानना चाहिए।* क्योंकि विविधतापूर्ण भारतीय सनातनी परंपरा में प्रारंभ से ही प्रकृति पूजा, देव पूजा, गुरु पूजा, पूर्वज पूजा, निराकार ब्रह्म उपासना, ईश्वर को नहीं मानने वाली धारा समानांतर रूप से चलते आ रहे हैं। भारत के ऐसे कई पुरातात्विक मंदिर/ स्थल हैं जहां सनातनी, जैन, बौद्ध  तीनों की मूर्तियां एक साथ मिलती है, जहां प्रकृति की भी पूजा हो रही  है ये है समन्वय।

दशावतारों में मत्स्य से लेकर राम कृष्ण बुद्ध कल्कि शामिल हैं ये है समन्वय।

मानस में शैव, वैष्णव, साक्त के देवी देवताओं को एक दूसरे की पूजा करते दिखाया गया है ये है समन्वय।

गुरुग्रंथ साहब में सभी पंथ के निर्गुण संतों की वाणी का संग्रहण किया गया ये है समन्वय।

सिक्ख गुरुओं का सनातन की रक्षा के लिए दिया गया बलिदान सर्वोच्च समन्वय का उदाहरण है।

सभी मार्ग, पंथ का उच्चतर उद्देश्य मुक्ति है विभाजनकारियों को इससे कोई मतलब नहीं, न उन्हें कोई आध्यात्मिक प्यास है बस उन्हें खंडन–मंडन करना है, समाज को खंडित करना है, कट्टरता फैलाना है। इन्हें अहंकारी ज्ञान से उपजे मौखिक दस्त से मुक्त हो जाना चाहिए।*

जो लोग खूब डिग्री लेकर 

राम vs बुद्ध,  कबीर vs तुलसी, फलाना जाति vs ढीमकाना जाति आदि  कर रहे हैं ऐसे विभाजनकारी मानसिकता वाले लोगों के कारण ही भारत विदेशी आक्रमणकारियों के कब्जे में रहा। अब जब समाज शिक्षित होकर सभी शोषण, अत्याचार, भेदभाव खत्म करने की ओर अग्रसर है तो ये कट्टर विभाजनकारी जाति, पंथ और पुराने महापुरषों के नाम पर बौद्धिक आतंकवाद फैला रहे हैं।

इतिहास में जाति के आधार पर अत्याचार व शोषण हुए आज भी छिटपुट जारी है जो कुछ ही समय में समूल नष्ट हो जायेगा। आज एकमुश्त वोटबैंक के लिए जातीय धार्मिक राजनीति का कॉकटेल चरम पर है। विशेष धर्म को विशेष जाति समूह का बताया जा रहा, उनमें टकराव पैदा किया जा रहा, भड़काया जा रहा है। भाषा, क्षेत्र/राज्य आदि की राजनीति तो है ही।  

 ऐसे में सोशल मीडिया पर विभाजनकारी मानसिकता की बाढ़ आ रही है। 1% सच्चाई में 99% प्रतिशत झूठ मिलाकर प्रवाहित किया जा रहा।

सोचते थे अधिक पढ़ लिख कर लोग समन्वय की बातें करेंगे पर बौद्धिक आतंकवाद फैलाने लगे।

रावण ही निकले।

*अच्छे जगह से पढ़े हुए , खूब डिग्री लटकाए, उच्च पदों पर बैठे विभाजनकारियों ये क्या कर रहे हो?????? कब सुधरोगे?????आखिर कब समझोगे इस देश की मिट्टी में मूर्ति पूजा, गुरु पूजा परंपरा, प्रकृति पूजा, पूर्वज पूजा निराकार ब्रह्म उपासना, ईश्वर को नहीं मानने वाले आदि सभी धाराएं समांतर चलती आ रहीं हैं क्योंकि मुंडे मुंडे मतिर्भिन्ना ( प्रत्येक मन भिन्न है जैसा भाव वैसा भजन) जिसे समग्र रूप से सनातन नाम दिया गया जिसके शुरुआत का पता नहीं*


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