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''भाव''-लघु कथा ''Bhaw''- short story

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 बेहद गरीब से दिखने वाले  बुजुर्ग के पास सब्जी लेने एक जोड़ा पहुंचा। बुजुर्ग सब्जी वाले ने जो भाव बताया वह उस जोड़े में से पहले को ज्यादा लगा उसने सब्जी लेने मना किया।  फिर भी दूसरे ने कहा कोई बात नहीं ले लेते हैं। पहले ने दूसरे से पूछा –ऐसा क्यों किया? ज्यादा भाव में क्यों ले लिया? दूसरे ने कहा अगर वह 2 –4 रुपए अधिक ले भी ले, तो क्या! गरीब है बेचारा,हम दान देते हैं ना। तब पहले ने कहा अच्छा अगर वह इसी तरह अभिनय करके आपसे ज्यादा कमा रहें हों तो?तो क्या? तब दूसरे ने कहा- तो भी क्या,मुझमें उन्हे देखकर जो मदद करने का भाव आया, उस भाव के लिए मैं उनका कृतज्ञ रहूंगा। यह ''भाव'' मनुष्यता के लिए जरूरी है। मोल–भाव तो जीवन में चलता ही रहेगा। इस ब्लॉग पर उपलब्ध अन्य लेखों (Articles) को पढ़ने के लिए कृपया नीचे दिये गए लिंक पर क्लिक करें।     https://darshakop.blogspot.com/?m=1

आभासी कदाचार (Virtual Malpractice)

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  आभासी कदाचार/कुप्रथा (Virtual Malpractice/Evil Practice)  एक नई सामाजिक कुरीति पनप रही है। इतिहास से लेकर अब तक हम कई सामाजिक कुरीतियों जाति प्रथा, रंग भेद, लिंग भेद,  सती प्रथा, बाल विवाह आदि आदि के बारे में जानते हैं। यह समझ आ रहा है कि अभी एक और सामाजिक कुरीति पनप रही है जिसे हम सोशल मीडिया में फेक, अवैध, अफवाह, झूठ के प्रसार  के रूप में देखते हैं। कोई एक दो शब्दों में इसे–आभासी पागलपन/ आभासी लापरवाही/ आभासी बदहवासी/ आभासी भूख/आभासी दुर्बलता/ आभासी कुप्रथा/कदाचार  भी कह सकते हैं। कोई भी व्यवस्था या खोज अच्छे उद्देश्य से अथवा अच्छी आशा अथवा अच्छी नीयत से समाज के सामने लाई जाती है या यूं कहे समाज को सुगम रूप से सरल रूप से  सुचारू रूप से चलाने के लिए लाई जाती है परंतु वही व्यवस्था धीरे-धीरे विकृत होने लगती है।आज इस इंटरनेट सोशल मीडिया के दौर में कोई भी मोबाइल चलाने वाला या सामान्य जानकारी रखने वाला इंसान सोशल मीडिया प्लेटफार्म में अथवा अपना चैनल  आदि बनाकर कुछ भी दावे करता है और उसको मानने वाले लोग भी मिल जाते हैं। दावा करने वाला हर इंसान झूठा नहीं ह...

विभाजनकारी Vs समन्वयवादी पार्ट- 2

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*वर्तमान में जो भी पढ़ा लिखा या अनपढ़ जीव अथवा जीव समूह भारत भूमि में प्राचीन काल या बाद में जन्में फले फूले धर्म, पंथ, समुदाय को आपस में विरोधी बता कर मैं श्रेष्ठ मैं श्रेष्ठ का प्रलाप करेगा उसे विभाजनकारी ही मानना चाहिए।* क्योंकि विविधतापूर्ण भारतीय सनातनी परंपरा में प्रारंभ से ही प्रकृति पूजा, देव पूजा, गुरु पूजा, पूर्वज पूजा, निराकार ब्रह्म उपासना, ईश्वर को नहीं मानने वाली धारा समानांतर रूप से चलते आ रहे हैं। भारत के ऐसे कई पुरातात्विक मंदिर/ स्थल हैं जहां सनातनी, जैन, बौद्ध  तीनों की मूर्तियां एक साथ मिलती है, जहां प्रकृति की भी पूजा हो रही  है ये है समन्वय। दशावतारों में मत्स्य से लेकर राम कृष्ण बुद्ध कल्कि शामिल हैं ये है समन्वय। मानस में शैव, वैष्णव, साक्त के देवी देवताओं को एक दूसरे की पूजा करते दिखाया गया है ये है समन्वय। गुरुग्रंथ साहब में सभी पंथ के निर्गुण संतों की वाणी का संग्रहण किया गया ये है समन्वय। सिक्ख गुरुओं का सनातन की रक्षा के लिए दिया गया बलिदान सर्वोच्च समन्वय का उदाहरण है। सभी मार्ग, पंथ का उच्चतर उद्देश्य मुक्ति है विभाजनकारियों को इससे कोई मतलब नहीं...

विभाजनकारी Vs समन्वयवादी पार्ट 1

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  आज देश में विभाजनकारी नहीं समन्वयात्मक विचारधारा की आवश्यकता है।वरना गृह युद्ध नजदीक है। अगर हम दशावतारों के बारे में  पढ़ें तो पता चलता है उसमें मत्स्य से प्रारंभ होकर राम,कृष्ण, बुद्ध, कल्कि भी शामिल है। ये समन्वय का उच्चतम प्रयास है। मानस में शैव,वैष्णव और शाक्त का सुंदर समन्वय किया गया है। टकराव नहीं है। मेरा, आपका  गांव, शहर, जिला, राज्य, देश,विश्व विविधताओं से भरा हुआ है कौन किसे पूजेगा मानेगा क्या करेगा यह उसकी व्यक्तिगत इच्छा है। एक ही जयंती या त्योहार को भारत के अलग अलग राज्यों में अलग अलग नाम से अलग समयों पर मनाया जाता है।ये विविध खूबसूरती सिर्फ भारत में दिखती है। हम आप इतिहास को ठीक से पढ़ें तो यही पता चलता है कि भारत में विविध पंथ,दर्शन  एक साथ फले-फूले   भारत समन्वय का देश रहा है इसलिए इतने सारे पंथ, संप्रदाय विकसित हुए। यहां भारत में जिन्होंने यह कहा कि भगवान नहीं है या मैं नास्तिक हूं जैसे सबसे बड़े उदाहरण है चार्वाक उसको भी ऋषि या महर्षि चार्वाक कहा गया किसी ने उसका सर नहीं काटा, न ज़हर दिया।  यह उदात्त भारतीय संस्कृति है। हम आप जैसे ...

KANTARA - Movie Review कांतारा - फ़िल्म समीक्षा

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  कांतारा (हिन्दी अर्थ-रहस्यमयी वन) फिल्म का अंतिम भाग  अपने भीतर के बीहड़ में खोज के लिए रहस्य सूत्र उपलब्ध  कराता है। यह फिल्म महान भक्त कवि सूरदास ( 1478 से 1583 ई) के दृष्टिकूट और कबीरदास ( 1398 से 1494 के  आसपास) के रहस्यवादी पदों की तरह रची गई है। फिल्म रूढ़  और प्रतीक चिन्हों से सराबोर है , जैसा कि दृष्टिकूट पदों में  हो ता है। फिल्म की कहानी शिव , पार्वती , विष्णु , पंजुरलि , गुलिगा देवों के पौराणिक कथानक( Mythology) सेअंकुरित ;  अभिनेता , निर्देशक व पटकथा लेखक ऋषभ शेट्टी(वास्तविक  नाम-प्रशांत शेट्टी) व उनके दल के तप से पल्लवित आधुनिक  सिनेमाई वन का विशाल वृक्ष है , जो सघन बेल-बूटों से ढंका  हुआ है। पंजुरलि देव ( शासक /शांत/वराह जिसे शिवजी ने  पृथ्वी पर भेजा) , गुलिगा देव (क्षेत्रपाल/उग्र/शिव के ही द्वारा  विष्णु की सेवा / रक्षा के लिए भेजे गए) के कथानक को जानने  के बाद कांतारा का गहरा आध्यात्मिक रहस्य सामने आता है।  जब तक पृष्ठभूमि/जड़ों से नाता न हो इस सिनेमाई वनवृक्ष  और दृष्टिकूट पदों क...

777 Charlie चार्ली - Movie Review फ़िल्म समीक्षा

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  मात्र स्वयं से प्रेम करते हुए किसी और ( इस फिल्म में चार्ली ) से प्रेम करना फिर प्रेम का भीतर उतरना अर्थात प्रेममय  होना सबसे प्रेम करना। एक प्रकार से एक भोगी का योगी बन जाना, सांसारिकता से आध्यात्मिक मार्ग पर चलना इस फिल्म के शुभ व सूक्ष्म  संकेत हैं।  आपने राजा भर्तृहरि की कहानी शायद सुनी हो। धर्मा(रक्षित शेट्टी) अपना जीवन एक ढर्रे  में जी रहा है। रोज सुबह अलार्म से पहले उठ जाना, वही सिगरेट, वही टीवी शो, वहीं इडली, वही गंदगी, वही बीयर, वही अस्त-व्यस्तता, वही अतीत का कोलाहल। अचानक एक दिन चार्ली (एक श्वान/Dog) उसके जीवन में आती है। वह भी प्रताड़ित होकर आई है।  चार्ली और धर्मा के करीब आने के सभी दृश्य आनंददायक और कमाल के हैं। धर्मा अपने ढर्रे के कारण ही चार्ली को अनजाने में अपना पालतू बना लेता है। फिल्म में डायलॉगबाजी नहीं है। दृश्य संवेदना ही फिल्म को उच्च श्रेणी का बनाती है। धर्मा के घर के सामने रहने वाली बच्ची (शरवरी) चार्ली के कारण ही धर्मा पर विश्वास करने लगी है, वरना वह धर्मा से बहुत डरती थी। धर्मा ज्यादातर मौन ही रहता है और उसके मौन को चार्ली, नाश्...