MUMBAI VARANASI EXPRESS SHORT FILM REVIEW ( Journey of Salvation) मुंबई वाराणसी एक्सप्रेस लघु फिल्म समीक्षा (मोक्ष यात्रा)

इस एक्सप्रेस के जनरल डिब्बे नंबर दो में एक  कैंसर ग्रस्त बुजुर्ग मरीज कृष्णकांत झुनझुनवाला ( दर्शन जरीवाला) चढ़ता है जिसके कदम बमुश्किल उठते हैं, हाथ  ऊपर नहीं उठते जिसमें छड़ी है और मुंह में छाले। वह उस सीट में जाकर बैठता है जिसके सामने एक पेटू, खबड़ू ( बहुत खाने वाला) बातूनी पात्र सतीश सुतारिया( शेखर शुक्ला) पूरा चेहरा ढककर गुजराती अखबार पढ़ रहा होता है। मानो कृष्णकांत किसी से भी बात ना करना चाहता हो। चाहता हो उसे कोई देखे भी नहीं। सतीश भाई जब कहते हैं कहां जा रहे हो तो कृष्णकांत कहते हैं- काशी.. बनारस । सतीश कहते हैं काशी बनारस दोनों एक ही है अंकल.. और ट्रेन का नाम है मुंबई वाराणसी एक्सप्रेस..जिसको जो मन आए वही कहता है। संकेत यही है किसी भी नाम, किसी भी धर्म में रहो या रखो, कुछ भी कहो, भेद व्यक्तिगत है, वह तो एक है। कृष्णकांत कहते हैं- आप भी बनारस जा रहे हैं? तो सतीश कहते हैं - सूरत..अभी तो मोक्ष (Salvation) के लिए बहुत टाइम है। पूरे रास्ते सतीश खाते और बातें ही करते है और एक कहावत कहते है-" सूरत में खाना खाओ और काशी में मोक्ष पाओ" कृष्णकांत उसे बड़े गंभीर आश्चर्य से देखते हैं कोई इतना खाना और बात कैसे कर सकता है! उसके हलक से तो चाय भी नहीं उतरती और बोलने को कुछ नहीं। सूरत में उतरते वक्त मोक्ष ज्ञान देता है कि -'स्टेशन के पास  सासूमा रेस्टोरेंट है वहां की थाली इंडिया में वर्ल्ड फेमस है सूरत में आना हुआ और वहां का खाना नहीं खाया तो बिल्कुल मोक्ष  नहीं मिलेगा ओंSS'। 


कृष्णकांत एक बड़ा उद्योगपति है जब डॉक्टर कहते हैं कि 2 महीने हैं एंजॉय युवर लाइफ ।अपने बच्चों के नाम खत लिखते हैं कि -अब तक मैंने जिंदगी जी ही नहीं, सिर्फ बिताई है अब जीना चाहता हूं। और कुर्ता पजामा पहन कर कुछ कपड़े और गीता साथ रख हाथ में छड़ी लिए थैला लेकर अपनी सारी दवाई फेंक कर चल पड़ते है काशी।  वाराणसी पहुंचते ही कई ऑटो, रिक्शा वाले पूछते हैं आइए साहब कहां जाना है? पर जब एक रिक्शावाला रफीक (विवेक सिंह) पूछता है मुक्तिधाम.. मोक्ष भवन जाना है तो वे तुरंत तैयार हो जाते हैं ।सनातन भारतीय परंपरा में मोक्ष/ मुक्ति अंतिम चाह रही है। भगवान/ देवता कभी भी लक्ष्य नहीं रहे वरना इतने सारे देवता ना होते। मानव ही असाधारण कार्य कर देवता हो जाते हैं ।,शिव, राम, कृष्ण, महावीर, बुद्ध,गुरु नानक,आदि संत परंपरा में अनेक उदाहरण है। जो हमारे लिए असाधारण क्षमता वान है चाहे वह जीव हो या निर्जीव पूजनीय हो जाते हैं जैसे सूर्य, पवन आदि समस्त प्रकृति। हम सचिन को क्रिकेट का भगवान कहते हैं। संत, पैगंबर, पीर सभी धर्मों में पूजे जाते हैं ।आगे भी ऐसे होंगे और पूजे जाएंगे। ये मोक्ष या मुक्ति प्राप्ति के साधन मात्र है। हमने मोक्ष प्राप्त के कई मार्ग खोजें। इस तरह भारत में मोक्ष प्राप्ति ही परम लक्ष्य रहा।

रिक्शा चलाते रफीक जब पूछते हैं- मोक्ष प्राप्त करने आए हैं साहेब, एक दो महीने में... तो कृष्णकांत कहते हैं- तुम्हें कैसे मालूम। रफीक कहते हैं एक्सपीरियंस है साहेब.. आदमी देख कर बता सकता हूं कितना टाइम बाकी है। काशी में मौत पर मातम नहीं खुशियां मनाई जाती है। आगे कहता है- अगर आपके घर वालों को पता ना हो या कोई ना हो तो मैं ही किरिया करम (क्रिया कर्म/ दाह संस्कार ) भी करवा दूंगा आप फिकर मत करना। मुक्तिधाम के मैनेजर पांडे जी कृष्णकांत से भी बुजुर्ग लगते हैं। गरीबों के लिए 15 दिन मुफ्त और अगर सक्षम है तो दिन का ₹50 किराया। जब कृष्णकांत एकमुश्त 3000 देते हैं तो पांडे जी यह कहते हुए पैसा वापस करते हैं कि होटल नहीं है साहब 30 दिन में खाली करना पड़ेगा या तो दूसरों के कंधे पर नहीं तो अपने पैर पर ।मरने वालों की भी वेटिंग लिस्ट (प्रतीक्षा सूची)लगती है मुक्तिधाम में। मुक्तिधाम का नजारा यूं है कि कहीं कोई बूढ़ा, कहीं कोई बुढ़िया जमीन पर अपने रिश्तेदारों के साथ मौत के इंतजार में लेटे हुए हैं। ऐसे ही एक दृश्य में एक व्यक्ति पूछता है- क्या लगता है बुढ़िया आज जाएगी? तो एक महिला संभवत बहू कहती है- पता नहीं हम तो 4 दिन से इंतजार कर रहे हैं,आज सुबह तो सांस बराबर चल रही थी ।जल्दी जाए तो हम लोगों को भी छुटकारा मिले।अगली सुबह उसी महिला के विलाप के साथ-साथ घंटों व मंत्रोचार के साथ कृष्णकांत नींद खुलती है। मणिकर्णिका घाट पर अकेले बैठे कृष्णकांत के पास एक बालक अक्षय कीर्ति (मास्टर अंश तिवारी) आकर  शरीर-आत्मा-वस्त्र संबंधी गीता ज्ञान बड़े चँचलता व आत्मविश्वास से करता है और वही पुरानी बात कहता है -मौत की फिकर मत कीजिए जो भी पैदा होता है उसे एक दिन मरना ही होता है। कृष्णकांत पूछते हैं -इस घाट में सभी से ऐसे बातें करते हो? तो बालक कहता है नहीं सिर्फ उनसे जो अकेले होते हैं। कहानी के बीच में कैलाश खेर का गाया-" मेरे बाबा जी निहारे आसमान से...."  गाना  एकांत में सुनकर मनन करने लायक है। एक दृश्य में पतंग उड़ाते अक्षय कीर्ति को कृष्णकांत कहते हैं- पतंग कट गई तो अक्षय कीर्ति कहता है- नहीं बस मांझा बदलने की तैयारी है।आज मेरे मांझे में बंधी थी तो मैं उड़ा रहा था कल किसी और के माँझे से बंधी होगी।  शरीर और आत्मा का रिश्ता है पतंग और मांझे में। एक छोटे बच्चे क्या काशी का जर्रा-जर्रा शरीर से अनासक्ति( लगाव नहीं रखने) का संदेश देता है। महान कबीर की यह जन्म व कर्म स्थली रही है। भक्ति धारा में सगुण और निर्गुण मुख्य शाखा है। निर्गुण पुनः  ज्ञान (संत) व प्रेम( सूफी) मार्गों में विभक्त हुए ।सगुण में ईश्वर के समस्त  साकार रूप समाहित है जैसे- राम, कृष्ण, शिव, गणेश आदि। काव्य में राम व कृष्ण ही लोकप्रिय हुए। कबीर निर्गुण-सगुण, हिंदू-मुस्लिम, नाथ, संत, सूफी, राम, गुरुग्रंथ साहिब सभी में सम्मिलित है। छत्तीसगढ़ में भी कबीर दास व संत गुरु घासीदास  इसी संत परंपरा के  पूजनीय  संत हैं। सुखद पहलू यह है कि -कबीर ने हिंदू- मुस्लिम दोनों को फटकारा  और दोनों उसे  अपना मानते हैं। दुखद पहलू यह है कि दोनों उत्तराधिकार के लिए लड़ रहे हैं पर उनके मार्ग का कोई अनुसरण नहीं करते।  सभी मत, धर्म, संप्रदाय आदि मानव कल्याण की बातों से भरे पड़े हैं। परंतु कट्टरवाद, मेरा ही मार्ग सही है, ऊंच-नीच आदि के कारण कुछ ठेकेदार बन गए जो मानवता के दुश्मन हैं। और कबीर ने सभी पंथ के इन्हीं पाखंडियों, अज्ञानियों, को लताड़ा है, उन्हें सनातन मार्ग से समस्या नहीं। महान भारत भूमि मे ही कबीर और इतने सारे मत, धर्म, संप्रदायों का उदय व प्रचार  संभव था क्योंकि यहां मार्ग,मत,देव लक्ष्य नहीं रहे मानव मात्र की मुक्ति मोक्ष ही सर्वोपरि रही है।  आज संविधान के पहरेदारी में प्रत्येक व्यक्ति समान है अगर कोई आपके ऊपर कुछ भी थोपना चाहे  तो उसके ऊपर कठोर कार्यवाही होगी। आपको ऐसे लोग भी मिलेंगे जो कहेंगे मेरे मत, संप्रदाय,धर्म में आ जाओ तुम्हें ईश्वर की कृपा और स्वर्ग  मिलेगा। किवदंती है कि कबीर ने जानबूझकर देह त्याग के लिए मगहर को यह कहकर(जो काशी तन तजै कबीरा, तौ रामहिं कहा निहोरा) चुना कि अगर मैं राम का सच्चा भक्त हूं तो कहीं पर भी मुक्ति/मोक्ष मिल सकता है। क्योंकि लोक प्रचारित था कि काशी में मरने से मुक्ति/स्वर्ग मिलेगी व मगहर में नर्क।  मुक्ति का सीधा अर्थ है- मन की स्थाई शांति  या अनासक्ति। जो आपको अपने भीतर कहीं भी रहने, किसी भी धर्म, मत, संप्रदाय, मार्ग आदि को मानने या नहीं मानने से भी मिल सकती है। काशी (बाबा विश्व नाथ का धाम) यही संदेश  देता है। अपने भीतर झांको तो सही।

30 दिन बीतने के बाद कृष्णकांत उस मुक्तिधाम से तुलसी का पौधा लेकर निकलते है जिसमें वह रोज पानी डालते थे। रफीक इस बार उसे अखाड़े में लेकर जाता है, वे वहीं रहने लगते है। अब उसे किसी छड़ी का सहारा नहीं चाहिए।  कहानी में रफीक बाबा विश्वनाथ के अवतार लगते हैं, तो बालक अक्षय कीर्ति संत कबीर के। दोनों के संगत में रहकर लोगों की सेवा, परोपकार ,बच्चों को पढ़ाते हुए, नित्य अनुशासित रहते हुए 2 माह में मरने वाले कृष्णकांत  स्वास्थ्य व  मुक्ति की ओर अग्रसर होते 1 वर्ष बीता देते है। एक दिन एक खोमचे  (छोटा दुकान) में  समोसा-जलेबी खाते पेपर पर अपने  खड़े किए गए उद्योग के बर्बादी का खबर पढ़ते हैं। यही कहानी का उत्कर्ष (climax) है। वह वापस जाने का फैसला करते हैं और रफीक को भी साथ चलने कहते हैं। रफीक कहता है-काशी के बाहर मेरा दिल नहीं लगेगा।उसके बाद की घटनाएं व अंत दिलचस्प है। अंत में  पार्श्व (background) में कबीर के दोहे कहे जाते हैं-  "माया मरी,न मन मरा, मर-मर गए शरीर; आशा तृष्णा ना मरी, कह गए दास कबीर"।  सभी ने उम्दा अभिनय किया है संवाद कसे हुए व सटीक हैं।  निर्देशिका आरती छाबड़िया को हम 'तुमसे अच्छा कौन है' 'फीयर फैक्टर- खतरों के खिलाड़ी' आदि में देख चुके हैं उन्होंने कमाल का निर्देशन किया है।


** पुरोनी(छत्तीसगढ़ी शब्द /extra notes )--मैंने आज दिनांक तक सूरत होते हुए मुंबई से वाराणसी जाने वाली ट्रेन को सर्च किया। पर एक भी ऐसा ट्रेन नहीं मिला। जितने भी मिले सब का मार्ग अलग था नासिक होते हुए। हो सकता है पहले चलता रहा हो या मुझे ना मिला। वैसे भी मार्ग के लिए कट्टर होना ही सारी फसाद की जड़ है। सृजनकर्ता को कल्पना के लिए पर्याप्त छूट भी प्राप्त है। क्या आदि शंकर के शब्दों में हम सब सृजनकर्ता के स्वप्न(कल्पना) में हैं?

  **ये शॉर्टफिल्म यूट्यूब पर उपलब्ध है**


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