हाई डेफिनेशन हरामखोरी-लघु कहानी
सुबह उसे सड़क के पूर्व दिशा में ढकी नाली पर बड़े-बड़े HD TV,फ्रीज, कूलर, एसी, वाशिंग-मशीन, प्यूरीफायर आदि के इलेक्ट्रॉनिक्स दुकान के कोने में बैठे देखता और शाम को सड़क के पश्चिमी किनारे खंडहरनुमा मकान के सामने खुली नाली पर पटरा (लकड़ी की चौड़ी पट्टी) बिछा कर बैठे देखता, सब्जी सड़क पर होती। निगम को फुर्सत कहां कि वो नालियों को ढक दे! उसे शहर की बर्बादी का कोई गम नहीं, नि-गम जो है। यह काम दुकानदार और रहवासियों का था, सो वे अपने -अपने सामने के हिस्से को ढक चुके थे। उसका सुबह का आशान्वित साँवला चेहरा शाम तक काला होकर खिल जाता। दिनभर की झुलसाती गर्मी में बड़े टुकने(बाँस से बुने पात्र) में टाँट से लिपटी सब्जी ताजी की ताजी रहती। बगल में प्लास्टिक की बाल्टी में पानी, तौलने के लिए ज़ंग खाया छिद्र युक्त तल वाला पुराना तराजू और 3 बड़े से छोटे पत्थर क्रमशः 1 किलो, आधा किलो और एक पाव के। पहली नजर में खरीददार को खटकते कि लूट मची है। वो एक ही सब्जी रखती है जो उस मौसम में ज्यादा होता है। वो सब्जी बाजार में नहीं बैठती, शायद वो होली के बाद यहां बैठना शुरु की है। पहले टमाटर, फिर बैगन,फिर लौकी और अब भिंडी। वो यही चिल्ला रही थी ₹20 के सवा किलो ताजी भिंडी….. ताजी भिंडी ₹20 के सवा किलो। दिन-भर लगातार। बाँकी जगह ₹20 का 1 कलो ही था। शायद उसे सब्जी बाजार से भगा दिया गया होगा। क्योकि वो अकेले बाजार की ताकत को चुनौती दे रही थी। एकाध बार मैंने अपने स्थाई सीमेण्टेड सब्जी दुकान वाले सेठ से गद्दारी करते हुए इससे बैगन वगैरा लिया था और पत्नी से दाद भी पाया था।
दूसरी समानांतर गली जहाँ नाली पूरी खुली हुई है के किनारे शराब दुकान,छोटे-छोटे दड़बानुमा चखना सेंटर और माँसाहारी-सह-शाकाहारी होटल हैं,जहाँ लगता है कि उस गली से उठने वाली बदबू से बीमार हुई मछलियों और मुर्गे-मुर्गियों ने स्वयं कड़ाही में कूदकर अत्महत्या की हो और खानसामा बचाने के चक्कर में ज्यादा न पकने दिया हो। इस गली में केवल शराबियों और लघुशंकालुओं की ही आवाजाही है। यहां शराब,माँस,गंदी नाली व मूत्र के सम्मिलित बदबू का अजीब वातावरण है।
लड़की दिनभर नाली के ऊपर ही बैठी रहती, आधे दिन पूर्वी, आधे दिन पश्चिमी। सुबह के बंद टिफिन का एक डिब्बा शाम तक उल्टा रखा होता,बताता कि उसमें जो भी रहा होगा चावल,दाल या सब्जी सब मिश्रित ही रहा होगा। नाली के ऊपर ही खाना खाती और सुबह शाम जब बीच-बीच में भूख लगे अपने पोटली से कुछ निकालकर खाती थी। मैं आज शाम बे-मन से बाजार निकला था परचून वाले और स्थाई सब्जी वाले सेठ से वफादारी निभाकर पत्नी की दाद पाने उस लड़की के पास भिंडी छाँट ही रहा था कि- एक गहने से लदी ,सजी-धजी, लीपिपुति,वजनदार संभवतः उच्च रक्तचाप से ग्रसित अधेड़ महिला मुँह फुलाए आई और लड़की से पूछी ``भिंडी कैसे ? जबकि लड़की अनवरत चिल्ला रही थी -`ताजी भिंडी ₹20 के सवा किलो'। महिला बोली मुलायम है?
हाँ माँजी, तोड़ कर देख लीजिए, कहकर उसने एक भिंडी को तोड़कर दिखा दिया।
"महंगा कह रही हो" पर्स से ₹20 का नोट निकालते हुए महिला आगे बोली `यह लो ₹20 डेढ़ कलो दे दो "
''नहीं पड़ेगा माँजी आप छाँट के ले लीजिए, ₹20 की ताजी भिंडी सवा किलो' लड़की विनम्रता से बोली। महिला कुछ गुस्से में उसकी खामी निकालते हुए बोली…. और टूटा तराजू और यह पथर, उसका क्या?
लड़की मौन रही।
तभी, पीछे से एक सज्जन आए और उस महिला के कंधे पर हाथ रखते हुए नरमी से बोले-यार तुम मान क्यों नहीं जाती। अभी सिर्फ प्यूरीफायर ही ले लेते हैं, हमारे घर में जो टीवी है वह बड़ा भी है और ठीक भी। स्पष्ट था वह उसके पति थे।
महिला आसपास से बेखबर हो तेज आवाज में चिढ़ते हुए बोल पड़ी -ले देकर तो इतना कहने पर एक छोटा कार लिए हैं आप, जीजा जी के बच्चे आते हैं तो डब्बा TV कहकर मेरे बच्चों को चिढ़ाते हैं ।
अचानक! महिला को आसपास अन्य लोगों के होने का एहसास हुआ तो अपने शान का खयाल आया और 20 का नोट अंदर रख कर दोनों हाथ हिलाते हुए बोली- देखिए जी, हालाँकि हमारा TV मोहल्ले में सबसे बड़ा है,अच्छी कंपनी का है, सब साफ-साफ दिखता है, अभी तक बिगड़ा भी नहीं , पर जगह ज्यादा घेरता है। हमारे यहाँ इतना सारा सामान है, सजावटी चीजें है कि इस TV के सामने सब फीका लगता है। दीवार में टांगने वाला बड़ा HD TV(हाई डेफिनेशन टीवी) कितना सुंदर लगेगा।
पति झुँझलाते से बोले-पर यार.... हमारे TV का एक्स्चेंज रेट भी कम लगा रहा है ,बस दो हजार हमने वो TV 38000 में खरीदा था।
तो… उस डब्बे का आपको दो लाख चाहए? महिला तुनककर बोली।
" पर HD का 75000 बोलता है जिसको तुमने पसंद किया है और...... महिला पतिदेव की बात बीच में ही काटते हुए बोली -अरे आप पहले खरीदने की तैयारी तो दिखाइए वह रेट भी कम करेगा। पतिदेव सर झुकाए सामने वाले दुकान की ओर मुड़ गए जहाँ बड़ी HD TV चल रही थी और लड़की का मुंह उधर ही था अतः वो न चाहते हुए भी HD का लुत्फ उठा रही थी।
महिला फिर से लड़की से मुखातिब हुई। महिला की पारखी नजरों ने ताजी मुलायम भिंडी को पहचान लिया था और लड़की की कमजोरी को भी। पर्स से फिर 20 का नोट निकालते हुए बोली- यह लो ₹20 डेढ़ किलो दे दो, छाँटूंगी नहीं।
नहीं पड़ेगा माँजी। लड़की दोहराई
''इस पत्थर और टूटे तराजू से तू हमें बेवकूफ बना रही है। पत्थर सही तौल का है? महिला ने कमजोरी उजागर किया।
हाँ माँजी, कम नहीं है। लड़की दृढ़ता से बोली।
अरे वाह! ऐसा पत्थर तुझे कहां मिल गया जो एकदम 1 किलो, आधा किलो और एक पाव का है। बाँकी लोग इस पारस पत्थर को ढूंढ नहीं पाए तो लोहे के तौल से काम चला रहे हैं... न!
लड़की ने इस जटिल व्यंग को नजरअंदाज कर दिया। पढ़ने के उम्र में दिनभर काम कर रही है। उसके पास पारस ना सही पर उसके अंदर का इस्पात मजबूत था, पत्थर को अपनी कमजोरी ना बनने दी और विनम्रता से बोली- माँजी आप कहीं और तौलवा लीजिएगा, थोड़ा बहुत फरक होगा पर बेईमानी नहीं करेंगे।
महिला पत्थर से ठोकर खा चुकी थी। अब संभलकर बोली ठीक है-ठीक है चल जो देना है दे दे । वह भिंडी छाँटने बैठी ही थी कि पतिदेव फिर आकर मायूसी से बोले- दुकान वाला बोलता है सिर्फ 2000 कम करेगा। बसss 1 मिनट में मोल-भाव करके आ गए। आपको भी ना…. न बात करने आता है न मोलभाव करने। अरे प्यूरीफायर ले रहे हैं,इससे पहले TV, फ्रीज, वाशिंगमशीन, मिक्सी,कूलर भी यहीं से ले गए थे और आगे एसी भी लेंगे।यह बताया आपने। महिला हर एक सामान के नाम के साथ-साथ श्रोता ढूंढ रही थी। ''नहीं। पति फ्लॉप हीरो सा बोला। यही तो! अपना पैसा फिर बैग में डालकर दोनों हाथ हिलाते हुए बोली- आपको कुछ करने नहीं आता, इससे अच्छा तो भैया के साथ आ जाती उन्होंने और जीजाजी ने 60-60 हजार में HD TV खरीदे।
हाँ...... ''पर कंपनी और साइज़ में भी तो फ़र्क होता है ना। पति ने बीच में हिट होने का असफल प्रयास किया। लेकिन महिला प्रधान फिल्म में कहाँ चलता। महिला एक्शन में उतारू हो गई।''वैसा ही है समझे... खूब मालूम है आपको तो मुझे साथ क्यों लाते हैं। एक सब्जी भी नहीं खरीद सकते मेरे बिना TV क्या खाक खरीदेंगे। मेरे भैया कभी भी गलत खरीदारी नहीं करते। जाइए, ठीक से मोलभाव कीजिए, मैं भिंडी लेकर आ रही हूँ।" निसहाय पति ऐसे मुड़ा मानो बच्चा बोर्ड की परीक्षा में फेल होकर घर नहीं जाना चाहता।
महिला तेजी से भिंडी छाँटने बैठ गई और भुनभुनाने लगी-बिना छाँटे लेती तो कड़ा-कड़ा भी दे देती। सभी भिंडी का सर जल्दी-जल्दी क़लम करने लगी जो हाथ में आता। भिंडी वाकई मुलायम थी, लगभग सभी पर महिला उसी को चुनती जो मन करता, बाँकी तोड़कर छोड़ देती।
आखिरकार ऊर्जा नाशवान नहीं है बस अपना रुप परिवर्तित करती है। अभी उसके पति पर क्रोध की तीक्ष्ण ज्वाला, संबंधियों से तकनीकी पिछड़ेपन की कुंठा के स्थाई ऊर्जा का परिवर्तन भिंडी पर सतही रुप में दिखाई पड़ रहे थे। मैं आलसी अपना भिंडी छाँट चुका था।इसी बीच लड़की सामने चलती बहुत सारी HD TV को देखकर सम्मोहित हो रही थी। बीच-बीच मे ताज़ी भिंडी........ चिल्ला रही थी। पति पत्नी के गरमा-गरम वार्तालाप से बेखबर वो दिनभर की झुलसाती गरमी को भूल कर शायद सपनों की झलकियां देख रही हो। मैं वार्तालाप से बाखबर था। पर HD के सम्मोहन से बच न सका पीछे मुड़ा तो देखा दस बड़ी TV में कोई एक ही धारावाहिक चल रही थी जसमे खलनायिका की कुटिलता को कैमरा भयानक संगीत के साथ दसो दिशाओं से दिखा रहा था। HD के एकदम साफ स्वर व तस्वीर में कुटिलता निखरकर सामने आ रही थी। मैं मुड़ा तब तक भिंडी तौला रहा था। इतना तो तय था कि HD के प्रति महिला का सम्मोहन खतरनाक स्तर तक पहुंच चुका था।मैं पैसा आगे बढ़ाया ही था कि महिला पूरी भरी पॉलीथन आगे बढ़ा दी।लड़की तत्परता से उसकी भिंडी मेरे पैसे नज़रअंदाज़ करके तौलने लगी।
''अरे बस-बस कितना निकालेगी एक तो पत्थर में कम तौल ऊपर से सोना तौल रही है?
लड़की 10 सेकंड तक तराजू के काँटे को स्थिर रखी रही जिसका झुकाव भिंडी के तरफ ही था। ये उसका मौन जवाब था। तभी एक पतले-दुबले वृद्ध सज्जन चश्मा चढ़ाये मुझे ठेलते हुए मेरे और महिला के बीच घुसते ही बोले -हाँ तो भिंडी क्या भाव।
20 के सवा कलो ताज़ी भिंडी।
ताज़ी है! ला... देखूँ तो!
हाँ बाबाजी और नरम भी कहकर लड़की एक और भिंडी शहीद कर दी। एक हाथ से मेरे पैसे ली दूसरे से महिला को पॉलीथन दी।मैं थैले में भिंडी डालकर जा ही रहा था कि लगभग HD दुकान तक पहुँच चुकी महिला को लड़की ने आवाज़ लगाई- माँजीzzz...पैसे...महिला ठिठककर मुड़ी और तेज़ी से चलते हुए लड़की के पास आ त्योरियाँ चढाकर बोली- पैसे! पैसे तो दिए थे ना?
'नही माँजी, आपने नही दिया।
! अरे! कैसे नही दिये। खरीदने से पहले 20 का नोट तो दी थी ना!
नही माँजी आपने नही दिया! लड़की दोहराई। महिला बिफरने लगी-मैं... मैं खाते-पीते घर की हूँ और झूठ नही बोलती।अभी-अभी तुझे पैसे दी थी, भिंडी लेने से पहले।
नही माँजी आपने नही दिया-लड़की तिहराई ।
ऐ जीzzz इधर आइये तो! पति जी स्वर की तीव्रता भाँप मोलभाव छोड़ भागे आये। आप आये थे तो मेरे हाथ मे 20 का नोट था ना? पति ने याद करने के अभिनय से कहा-अsss हाँ था, तो?
तो क्या! इस लड़की को दे दी थी।अब कहती है नही दी।
नहीं माँजी आपने नही दिया। शायद वापस रख ली होंगी-लड़की विनीत स्वर में बोली।
मैं!मैं चोरी करूंगी वह भी तेरे जैसे सड़क छाप सब्जी वाले का, इसीलिए मैं पहले पैसे नहीं देती। एक तो तौलने को पत्थर, टूटे तराजू से काँटा मार रही है और ऊपर से इल्जाम लगाती है। भीखमंगी कहीं की।
लड़की रूआँसी हो गई भरे गले से बोली-नहीं साहब इन्होने पैसा नहीं दिया।आप इनका पर्स देख लीजिए, पैसा वहीं होगा।
महिला अब आपा खो चुक थी। तू! तू मेरे पर्स की तलाशी लेगी तेरे जैसे नहीं है कि 10 -20 का हिसाब रखेँ। कईयो हजार पर्स में रहते हैं।10-20 रुपए चोरी हो जाए तो भी पता नहीं चलता कम हुआ है। लेकन बेईमानी! बेईमानी बर्दाश्त नहीं करूंगी ₹20 तू प्यार से माँग लेती तो दे देती, पर इल्जाम लगा रही है। महिला में हर उस शख़्स का अक्स नजर आ रहा था जो अपनी गलती कभी नहीं मानते और उनके मुताबिक न करो तो दुश्मनी करते हैं।
लड़की के आँसू निकल आए। भर्राए गले से गुहराई। नहीं साहब, माँजी ने पैसे नहीं दिए भगवान कसम मैं झूठ नहीं बोल रही हूँ। एक हाथ से मैले दुपट्टे से आंसू पोछते हुए दूसरे हाथ से अपने कण्ठ को पकड़ी।
तब पतिदेव तरस खाते हुए बोले- छोड़ो ना। दे दो भूल-चूक हो जाती है ₹20 ही तो...... महिला बीच में ही बात काटते हुए बोली -अच्छाsss बच्चों के लिए TV लेने में तकलीफ है और यहाँ बड़े दानी बन रहे हो, और मुझे चोर-बेईमान और मेरे भैया को अनाड़ी समझते हो। ऊर्जा पूर्ण रूपेण परिवर्तित हो रही थी। व्यक्ति छोटी -छोटी महत्वपूर्ण बातों को जो उसे बड़ा बनाते हैं आसानी से भूल जाता है। पर अपनी झूठी शान की रखवाली कभी नहीं भूलता। हम बड़े-बड़े कंपनियों और आलीशान शो-रूम से लुटने को तत्पर रहते हैं पर गरीब का घर हमारी थोड़ी उदारता से चल जाए इसका खयाल नहीं रखते।
तभी वृद्ध जज की भूमिका में व दुकानदार 75,000 के ग्राहक का मन बिगड़ता देख बचाव पक्ष के वकील के रूप में नौकर को गवाह बना कर पेश हुए।
लड़की असहाय।
वृद्ध आदमी -अच्छा। तुझे भगवान की कसम। एक उंगली ऊपर उठाते हुए -क्या इन्होंने पैसे नहीं दिए? लड़की आँसू पोछते बोली -नहीं बाबा... न……. दुकानदार जोरदार तरीके से बीच में बात काटते हुए बोले -क्या रोने का नाटक कर रही है।दोपहर तक रोज हमारे दुकान के सामने बैठकर सब्जी बेचती है आधा ग्राहक तुझे ही देखकर पलट जाते हैं। तभी नौकर बोला- रोज का ₹20 तुमसे हमारा बनता है पर 3 माह में ₹1 भी नहीं दिए।
लड़की मैले दुपट्टे को आँखों में लगाकर बिलखते हु ए बोली-साहब सब्जी तो देती हूँ ना।
अच्छा दो-चार बार सब्जी क्या दे दी हमारा दुकान तुम्हारा हो गया। जो यहाँ रोज आकर बैठ जाती है।
लड़की फफक पड़ी। झुके हुए मुंह से रूदन निकला- आपसे पूछ कर ही तो बैठती थी साहब।
ठीक है। तो कल से यहाँ नजर मत आना।
तभी वृद्ध बोले-और कोई था जो बता सके, मैं बाद में आया था इसलिए कुछ कह नहीं सकता। हाँ! हाँ एक आदमी था कहते महिला इधर-उधर नजर दौड़ाई। मैं दिख गया। वो…वो था । नौकर ने मुझे आकर बुलाया। मैं सब कुछ सुन चुका था पर उधेड़बुन का मारा अनभिज्ञ बना रहा।
वृद्ध ने पूरा वाकया सुना कर मुझसे पूछा-आपने रुपए देते देखा था? मैंने कहा- जहाँ तक मुझे याद है, इन्होंने रुपए नहीं दिए। लड़की के आँसू भरे नेत्र और छलक कर मुझे धन्यवाद दे रहे थे। महिला की वक्र दृष्टि से मैं नजर बचा गया पर तीखी वाणी से ना बच सका। महिला बोली-इनके कहने से क्या होता है? मैं बोल रही हूँ न! मैं दी हूँ।कोई मुझे देखेगा तभी खरीददारी करुंगी क्या? मैं निशब्द और स्तब्ध रह गया।
तभी नौकर ने HD अस्त्र दागा- इस लड़की को भी क्या याद रहेगा दिनभर बैठकर हमारे दुकान के TV को देखती रहती है जैसे कभी ना देखी हो। दुकानदार ने सुर मिलाया हाँ-हाँ रोज इसका यही काम है। आकर TV देखना इसीलए दोपहर बाद इस तरफ आकर बैठती है।फिर कहता हूँ, कल से तू इधर मत आना वरना सब नाली में फेंक दूँगा, तुझे भी। नौकर ने हां में हां मिलाया और बोला आप लोग चलिए इसका ड्रामा खत्म नहीं होगा। सब दुकान चले गए। लड़की रोते-रोते मुँह छुपा कर बैठ गई।
उन HD वाले बेचारे-लाचार, कमजोर, बेबस लोगों को ये नहीं लगा कि यह मजबूत, मेहनती, विनम्र लड़की बस तेज धूप से बचने सूर्य से लुका-छिपी खेलती है।इस किनारे से उस किनारे बैठती है। मैंने और उस वृद्ध सज्जन ने पैसे देने की पेशकश की तो वो डबडबाई आँखों से सिसकते हुए बोली- नहीं साहब आप पैसे दे दिए थे। मेरी आँखे नम हो गई। उस भले वृद्ध ने ढाँढस बंधाते हुए कहा-मत रो बेटी । कभी-कभी बड़े-बड़े गलती कर जाते हैं। चल ₹40 की भिंडी दे दे।
दूसरे दिन मैं चाकरी से लौटते उससे भिंडी लेने पहुंचा। लड़की सचमुच वहाँ नहीं थी! थोड़ा आगे बढ़ा तो वही आवाज...ताजी भिंडी…... सुनाई पड़ी। मन को अच्छा लगा।वो दिनभर HD वाली और शराब दुकान वाली सड़क को जोड़ने वाली पूर्व से पश्चिम जाने वाली गली में चिलचिलाती धूप में सिर के ऊपर तौलिया डाले बैठ रही होगी और पूरे जोश के साथ बीच-बीच में चिल्लाती होगी ताजी भिंडी ₹20...... मैं उसको बोला लाओ बेटा ₹40 का दे दो बिना छाँटे। वो पहचान गई और बोली-नहीं साहब छाँट कर लीजिए मुझसे गलती हो जाएगी तो आप फिर नहीं आएंगे। मेरे मन के कचरे में से कुछ फिर पिघले और अंदर से गद्दारी का भाव सदा के लिए जाता रहा।
इस ब्लॉग पर उपलब्ध अन्य लेखों (Articles) को पढ़ने के लिए कृपया नीचे दिये गए लिंक पर क्लिक करें।https://darshakop.blogspot.com/?m=1

Comments
Post a Comment