CHHICHHORE -MOVIE REVIEW छिछोरे- फिल्म समीक्षा"
CHHICHHORE -MOVIE REVIEW छिछोरे- फिल्म समीक्षा"
फिल्म की कहानी loser (हारनेवाले) से प्रारंभ होकर, लूजर वह होता है जो खुद से हार जाए और फिर योद्घा(fighter) होना मुख्य है हार जीत के मायने नहीं तक का सफर है। लूजर शब्द का प्रयोग कई बार हुआ है। छिछोरे (ओछा, नीच, मामूली कमीना,परेशान करने वाला/cheap,indecent,vulgar) शीर्षक दिया गया है।चूंकि ये कॉलेज छात्रावास में बिताए घटनाक्रम है उस समय लगभग हर विद्यार्थी ऐसे ही शैतानियां करता है।ऐसे में इसे छिछोरापन कहे तो उचित नहीं लगता। पात्रों का परिचय भी लूजर नंबर 1..2..3..4 आदि रूप में किया गया है। उच्च श्रेणी की संस्थाओं में जहां प्रतिभाशाली लोग ही जाते हैं एक ऐसा समूह अपने आप तैयार हो जाता है जिसे लूजर या नकारा मान लिया जाता है। यह आवारापन के कारण हो सकता है या अपने गुणों को अनदेखा करने के कारण हो सकता है। यह भी सच है कि वे भी बाद में एक सफल जीवन व्यतीत कर रहे होते हैं। खैर निर्देशक नितेश तिवारी जो स्वयं आईआईटी मुंबई के विद्यार्थी रहे हैं ने इंजीनियरिंग छात्रावास और छात्रों के जीवन की पश्चझलकियों (flashback) और वर्तमान को बिल्कुल सलीके से गूंथा है। पृष्ठभूमि मे खेल, सामूहिक एकता व कमजोरियों से उबरने की जद्दोजहद है । सभी पात्रों अन्नी( सुशांत) माया( श्रद्धा) सेक्सा( वरुण शर्मा ) मम्मी (तुषार पाण्डे) एसिड (नवीन ) बेवड़ा (सहर्ष) डेरेक ( ताहिर) का अतीत और वर्तमान क्रमशः कालेज मे स्वयं के लूजर टैग (हारने वाले का ठप्पा) हटाने और फिर पालक बनने के बाद राघव (मो.समद) जो कि अन्नी और माया का पुत्र है के अंदर से लूजर की भावना को हटाने के लिए मिलकर लड़ते नजर आते हैं।
फिल्म पूरा मनोरंजन करती है। सेक्सा अपने नाम के अनुरूप है और हर दृश्य में हंसाता है ।उसके संवाद खेल नहीं रहा पर झेल रहा ,मेरा बंटी लोड नहीं ले पाएगा, पॉटी पर धनिया,even वाहेगुरु can't save आदि बिल्कुल सही समय और भाव भंगिमा से पेश किए गए हैं। कुछ Toilet Jocks भी हैं। वरूण के रूप में एक उम्दा हास्य कलाकार मिला है। बेवड़ा (शराबी) एसिड (क्रोधी/ गाली देने वाला ) मम्मी का नामकरण उनकी आदतों से निकल कर आए हैं। विद्यार्थी जीवन में दोस्तों के द्वारा उपनाम दिए ही जाते हैं। ये नाम प्रायः आदत, शरीर या नाम को आधार बनाकर दिए जाते हैं जो उन्हीं के द्वारा जीवन पर्यंत पुकारे जाते हैं और अच्छा भी लगता है। पश्च झलकियों को वर्तमान में गूंथने का सफलतम और बेजोड़ उदाहरण फिल्म- स्लमडॉग मिलेनियर" में मिलता है जो विकास स्वरूप द्वारा इसी नाम से लिखित उपन्यास पर आधारित है। फिल्म का मूल संदेश जीत- हार, सफलता -असफलता को दरकिनार कर अपना संपूर्ण समर्पित कर्म कर जीवन का आनंद उठाने का है (कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन) जो कि बहुत पहले ही कहा जा चुका है। एक मार्मिक दृश्य में अन्नी द्वारा बोला गया यह संवाद- 'यार हमने सफलता के बाद क्या-क्या करना है यह तो तय किया था पर असफलता को कैसे deal (निबटना) करना है यह कभी नहीं सोचा" इसके तुरंत बाद मम्मी अपने बेटे को फोन करता है। फिल्म हर वर्ग को मनोरंजन व संदेश देती है। 3 इडियट्स और इसमें सिर्फ इंजीनियरिंग शब्द की समानता है और कुछ नहीं। मुख्य किरदार अन्नी को superhero (अतिंद्रीय नायक ) के रूप में पेश नहीं किया गया है जैसा कि स्टूडेंट ऑफ द ईयर 2 में नायक अंत में कबड्डी में अकेले सातों का शिकार करता है। ऐसा कोई दृश्य नहीं जिसमें अतिरेक हो ।माया का कॉलेज में आगमन और अंत में बास्केटबॉल मैच के दौरान के दृश्य में वही पहनावा (dress) है। मम्मी के पिताजी इस बात से परेशान है कि उसका बेटा बेहद सीधा-सादा है और हमेशा मम्मी- मम्मी करता है। कुछ समय बाद पिताश्री उसके कक्ष में सिगरेट, शराब और प्लेबॉय पत्रिका देखकर डांट का झूठा दिखावा कर अंदर से बेहद खुश होते हैं। छात्रावास की बात ही निराली होती है वहां पर रहते-रहते सबकी थोड़ी-थोड़ी आदतें सब में चली जाती है और वहां से निकलने तक लगभग सभी 16 कला पूर्ण हो जाते हैं। बेवड़ा का पात्र गंभीर रहता है। एसिड ऊर्जावान चलता फिरता गाली का भंडार है। अन्नी और डेरेक सारा तिकड़म रचते हैं। श्रद्धा को साहो की अपेक्षा इस फिल्म में ज्यादा अदाकारी का अवसर मिला है। रैगी (प्रतीक बब्बर), अन्नी(H3) के विरोधी दल(H4) का है। फिल्म देखते वक्त लग रहा था कि रैगी का भी अधेड़ पात्र आ जाएगा क्योंकि हास्टलर्स निकलने के बाद बेहद करीबी दोस्त बन जाते हैं। छोटे-छोटे किरदार जैसे- हास्टल बाँटनेवाला का हो जो कहता है-'बेटा गूह खा के ही मानेगा; या रसोइया(फर्जी कबड्डी कोच) के हाव-भाव; या 45 किलो के अधिकवजन वाले (Overweight) भारोत्तोलक (weightlifter) का हो मजेदार एवं प्रभावशाली हैं।weightlifting स्पर्धा का पार्श्व संगीत(background music) एकदम सटीक लगता है। अन्नी और माया अब तलाकशुदा अधेड़ हैं। यह अजीब पीड़ादायक विडंबना है कि लड़का- लड़की एक दूसरे को बेहद प्रेम करने का दम भरते हुए शादी करते हैं फिर अलगाव हो जाता है। इससे यह तो स्पष्ट हो ही जाता है कि हम स्वयं को ही नहीं जान पाए। रिश्ते बिना बोले एक दूसरे की बात समझने से लेकर जिक्र भी ना करने तक आ जाते हैं। कालेज में माया से मिलने के बहाने बनाने वाला अन्नी अपने बेटे से कहता है -''जा तू ही उसकी हाय ले ले"। फिल्म मे यह भी है कि कमजोरियों का त्याग संघर्ष को धार प्रदान कर सफलता के करीब ले जाता है।
गौरतलब है कि नितेश तिवारी की निर्देशित फिल्मों- चिल्लर पार्टी, भूतनाथ रिटर्न, दंगल और अब छिछोरे में बच्चे अहम किरदार रहे हैं या यूं कहें कहानियां उन्हीं को केंद्र में रखकर बुनी गई हैं। बच्चों/किशोरवयों द्वारा आत्महत्या व उसके प्रयास सर्वाधिक होते हैं क्योंकि यह तीव्र व असंतुलित भावावेग का काल है। हल्का धक्का भटका देता है। माता-पिता व करीबियों की पर्वतीय अपेक्षाओं के नीचे दबा बच्चा उसमें खुद को लहूलुहान करते हुए अवसादी सुरंग बनाता है और पर्वत पर चढ़कर छलांग लगा देता है माता-पिता उसे पैर फिसलना समझते हैं। गाने अर्थपूर्ण व परिस्थितिजन्य लगते हैं- 'कल की ही बात है; 'वो भी क्या दिन थे; ''कंट्रोल..; 'फिकरNOT" गहरे अर्थ वाले गाने हैं जिनके गीतकार अमित भट्टाचार्य व संगीतकार प्रीतम हैं। फिल्म के अंत में कहे गए ये वाक्य .''........... इतना उलझ गए हैं कि जिंदगी जीना भूल गए हैं। अगर जिंदगी में सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण कुछ है तो वह है खुद जिंदगी'' अक्सर हम यह भूल जाते हैं और खुद को व्यवहारिक(PRACTICAL) मानते हुए चिर-फाड़ में लग जाते हैं और तब हम खुद असंतुलित होकर छिछोरे (दूसरों को परेशान करने वाला) बन जाते हैं। अपने दोस्तों को याद करिए, मिलिए और परखिए स्वयं कैसे थे। साभार -''यूं ही बेसबब न फिरा करो, कभी घर भी अपने रहा करो; वो जिंदगी की किताब है, उसे चुपके चुपके पढ़ा करो।''
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