CONTAGION(in reference with CORONA) MOVIE REVIEW कन्टेजियन(कोरोना के संदर्भ में) फिल्म समीक्षा
CONTAGION(in reference with CORONA) MOVIE REVIEW कन्टेजियन(कोरोना के संदर्भ में) फिल्म समीक्षा
वर्तमान कोरोना कालखंड की जो भयावहता हम महसूस कर रहे हैं उसे इस फिल्म में देखा और समझा जा सकता है। मि. एम्हॉफ (मैट डेमन) को यकीन नहीं होता उसकी पत्नी और बेटा मर गए! कल तक तो सब ठीक था ।डॉक्टर किस वजह से जान गई है बता नहीं पाते हालांकि की बहुत सारी बीमारी का नाम लेते हैं। फिल्म के अनुसार बीमारी की शुरुआत हॉन्गकॉन्ग से पूरे विश्व में फैल गई जैसे आज वुहान से। हॉन्गकॉन्ग चीन का ही एक स्वायात्त क्षेत्र है जो चीन से आजादी चाहता है। वहां के क्रांतिकारी इसके लिए हमेशा संघर्षरत रहते हैं। अंब्रेला मूवमेंट यही से उठा था। फिल्म में जैविक आतंकवाद, लचर सरकारी नीतियों, आर्थिक लाभ, सोशल मीडिया अफवाह,संत्रास/ भगदड़(PANIC) व स्वास्थ्य कर्मियों की निस्वार्थ सेवा को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया गया है। एक दृश्य में जब डाक्टर चीवर ( लौरेंस फिशबर्न )को एक सैन्य अधिकारी संक्रमण के बारे में कहते हैं-" किसी को पता ना चले,जब तक सबको पता ना चल जाए" सीधा अर्थ है सरकार पहले आधिकारिक घोषणा नहीं करना चाहती कि महामारी आ चुकी है। यह हमें वर्तमान में फिर अमेरिका में देखने को मिला। डॉक्टर चीवर पूरे फिल्म में हर परिस्थिति से सामंजस्य बिठाते दिखते हैं। फिल्म में हांगकांग के लोग डब्ल्यूएचओ के साथ अमेरिका के मिलीभगत का आरोप लगाते हैं और इस कोरोना कालखंड में अमेरिका डब्ल्यूएचओ का चीन के साथ मिलीभगत का आरोप लगा रहा है। एक स्वयंभू सच्चा ब्लॉगर पत्रकार एलन क्रूमविडी (जुड लॉ) जिसके12 मिलियन फॉलोअर है इसमें फार्मा कंपनियों, अमेरिकी सरकार की साजिश देखता है और और स्वयं को संक्रमित बताकर एक दवाई को लाइव खाकर कहता है-अगर सुबह तक मैं जीवित रहा तो समझो यह काम कर रहा है।सरकार झूठ बोलती है कि यह ऐसी महामारी है जिसका इलाज नहीं ढूंढा जा सका है ।बाद में पुलिस उस पत्रकार को पकड़ कर ले जाती है और पता चलता है कि उसे कोई संक्रमण नहीं था वह बस उस दवाई का प्रचार कर रहा था ।उस पर यह भी आरोप लगता है कि वह किसी फार्मा कंपनी से पैसा खाया है पर जमानत हो जाती है । यह उन समस्त स्वयंभू पत्रकारों और लोगों की ओर इशारा है जो हर बात को षड्यंत्र बता कर अपने चाहने वालों को बरगलाते हैं कि आपको धोखा दिया जा रहा है। एक खोखली क्रांति का स्वांग रचते हैं और अपना उल्लू सीधा करते हैं। उनका अपना एक ही निष्कर्ष है -'मेरी मुर्गी एक टांग'। यह पत्रकार लोगों को टीका लगवाने को भी मना करता है। इस फिल्म में धार्मिक पक्ष को दरकिनार कर सही किया गया है। हमारे महान भारत में कुछ लोग धार्मिक कर्मकांड, व मान्यता के सामने वायरस को प्रभावहीन, अफवाह, अपनी धार्मिक आस्था पर प्रहार और कमतर मान कर अपने जिद पर अड़ते, भागते, छुपते फिर रहे हैं! डॉक्टर, नर्स, सफाई कर्मी, पुलिस पर हमला कर रहे हैं! थूक रहे हैं! बेअदबी कर रहे हैं! फिल्म में डॉक्टर मीयर्स (केट विंसलेट) संक्रमण होने के बावजूद इस समर्पण के साथ अपना कर्तव्य निभाती है कि अपने अंतिम वक्त में भी वह बगल में लेटे मरीज को गर्म कपड़े देने का प्रयास करती है। दृश्य मार्मिक है। उन्हें इस महामारी के विशेषज्ञ होने के नाते वहां से विमान के द्वारा ले जाया जा सकता था पर एक जनप्रतिनिधि की खातिरदारी में संलग्न विमान उपलब्ध नहीं हो पाता। फिल्म में क्वॉरेंटाइन, आइसोलेशन, इनक्यूबेशन पीरियड आदि सभी शब्दों का प्रयोग हुआ है। एक और मार्मिक दृश्य में जब टीके का परीक्षण बंदर पर सफल दिखता है तो डॉक्टर एली (जेनिफर ) मानव परीक्षण के लिए सरकारी अनुमति, उपलब्धता आदि में समय बर्बाद करने के बजाए स्वयं के ऊपर परीक्षण करती है और अपने डॉक्टर पिता जो इलाज करते बीमार पड़ गए थे का मास्क निकालकर माथे को चुमती है तो पिता आंसू लिए कहते हैं जिस डॉक्टर ने पहले ऐसा किया था उसे नोबेल मिला था । हांगकांग में संक्रमण के जड़ का पता लगाने गई डब्ल्यूएचओ की डॉक्टर लियोनोरा (मारियोन कोटिलार्ड) को तब तक के लिए बंधक बना लिया जाता है जब तक डब्ल्यूएचओ अपहरणकर्ताओं को टीका नहीं देता। फिल्म में यात्राओं की पोल भी खोली गई है कि- घर में बताए नहीं,गए कहीं और ! क्या पता भारत में जो लोग छुप रहे हैं वह किसी और गतिविधि के भंडाफोड़ होने के डर के कारण सामने ना आ रहे हों।
लूटमार,आगजनी,तोड़फोड़ के बीच जब इमरजेंसी नंबर लगाया जाता है तो वहां दो विकल्प आते हैं पहला बीमारी का लक्षण दूसरा मौत की सूचना और लाश हटाने के लिए। निरंतर आंकड़े बढ़ रहे हैं हम सब को समझना होगा अपनों की लाश उठाने या खुद लाश बन जाने से अच्छा है जिंदादिली से सीमित संसाधन के साथ घर में कैद रहें। जब तक यह खत्म नहीं हो जाता। फिल्म के अंत में संक्रमण कैसे प्रारंभ हुआ और DAY-1 (प्रथम दिन) का विवरण है कि कैसे एक कंपनी एक वन भूमि का विनाश कर समतलीकरण करती है चमगादड़ उजड़कर सूअर पालन केंद्र में आ जाते हैं। चमगादड़ों के खाए केले के टुकड़े सूअर खाते हैं और उस सूअर को जायकेदार बनाने वाला बावर्ची इस कंपनी के एक्जीक्यूटिव से हाथ मिलाता है और तबाही शुरू। फिल्म के वायरस में चमगादड़ और सूअर के डीएनए पाए गए थे। कोरोना में भी चमगादड़ के डीएनए मानव को उल्टा लटकाए हुए हैं। जब हम बिना सोचे समझे अंधाधुन तरीके से प्रकृति का दोहन करते हैं उसे अव्यवस्थित करते हैं तो प्रकृति व्यवस्था में आने के लिए बहुत क्रूर तरीका अपनाती है तब हमें सोचने समझने का मौका नहीं मिलता। लगभग पूरे विश्व के घर में कैद रहने का यही आशय है कि मानव का प्रकृति में अनावश्यक दखलअंदाजी फिलहाल बंद है। फिल्म में कोई एक मुख्य पात्र (नायक /नायिका ) नहीं है बस एक विलेन है वायरस। सत्य ही है वायरस के खिलाफ हमें साथ मिलकर लड़ना होगा। वो हर व्यक्ति नायक/नायिका है जो सतर्क, जागरूक व घर में है। मि. एम्हॉफ मजबूत प्रतिरोधक क्षमता वाला है। महामारी से मर चुके बीवी, बच्चे के बाद जब आइसोलेशन में उसकी बेटी आकर कहती है - मुझे यहां होना था आप अकेले पड़ गए तब एम्हॉफ कहता है - अच्छा हुआ तुम नहीं थी वरना हम बात नहीं कर रहे होते। प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाना हर प्रकार की बीमारी के खिलाफ लड़ाई में कारगर शस्त्र है। फिल्म के संवाद-" हम अपना हाथ खोलकर( हाथ मिलाते हुए) यह बताते हैं कि हम नुकसान नहीं पहुंचाना चाहते।पता नहीं यह वायरस को पता था या नहीं" और "हर किसी की इतनी दूर दृष्टि नहीं होती कि वह कैमरे के सामने मरे" याद हो जाते हैं। 133 वें दिन टीके लगाने के लिए लॉटरी द्वारा जन्म दिनांक का चुनाव किया जाता है।इस दौरान डॉ एली अकेले बैठकर दवाओं का बैच नंबर ट्रैक कर रही होती है।उन्हें मशहूर होने का लालच नहीं। अपहृत डब्ल्यूएचओ डॉक्टर को छुड़ाने आया आदमी अपहरणकर्ताओं को चीन के दबाव में Placebo ( झूठी दवाई) देता है यह बात जानकर डॉक्टर फिर से उन अपहर्ताओं के पास लौट जाती है।
लाश को परिजनों को नहीं सौंपा जाता। सब धरा का धरा रह जाता है। सारे कर्मकांड, रीति- रिवाज, धार्मिक अनुष्ठान केवल सामान्य काल में शोभा और सुकून देते हैं।आपात काल में हर बार यह साबित होता है कि मानव ही सभी संकल्पनाओं का रचयिता है और जब चाहे उसे नकार सकता है। कहीं कोई ऊपरवाला बुरा नहीं मानता। प्रत्येक मानव स्वयं का पैगंबर है अब हमें तय करना है अपने मौत का पैगाम पढ़ते हैं या जिंदगी का।
**पुरोनी(छत्तीसगढ़ी शब्द/ Extra Notes)- वर्तमान बीमारी का नाम COVID-19 है। वायरस का नाम SARS-CoV-2 (Severe Acute Respiratory Syndrome CoronaVirus-2) है। श्वसन तंत्र पर हावी विषाणु कुछ वर्षों के अंतराल पर लगातार महामारी फैला रहे हैं। श्वसन तंत्र पर काम करिए। योग विज्ञान श्वसन तंत्र नियंत्रण पर ही केंद्रित है। योग धार्मिक नहीं वैज्ञानिक अवधारणा है। साथ ही नुसरत साहब का गाया सूफी-" सांसो की माला में सिमरु मैं पी का नाम.... भी सुन सकते हैं।
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