मिशन मंगल फ़िल्म समीक्षा -Mission Mangal movie Review
मिशन मंगल फ़िल्म समीक्षा -Mission Mangal movie Review
तार्किक और वैज्ञानिक (यहां कहने का मतलब यह है कि इसमें किसी प्रकार का फ़ूहड़ और बेहूदा या अश्लील हास्य का प्रयास नहीं है) मनोरंजक फिल्म है। किरदारों का एक एक करके मनोरंजक आगमन का दृश्य हो, मिशन में व्यवधान के बाद उनकी प्रतिक्रिया हो, उनके काम करने का तरीका हो या व्यक्तिगत जिंदगी हो। पात्र अंत तक वैसे ही निर्वाह किए गए हैं। निर्देशक जगन शक्ति और Creative( रचनात्मक) निर्देशक आर. बाल्की ने एक एक संवाद यूं कहें एक एक शब्द पर काम किया है। एक भी शब्द व्यर्थ नहीं लगता। जैसे- संजय कपूर का पात्र पूछते हैं -"पैसा कहां भरना है" तो उनकी बेटी कहती है "स्टॉक मार्केट।'' ये दो शब्द उसके चिड़चिड़ेपन, निठल्लेपन,भड़ास के कारण को बखूबी बयां करते हैं ।अंत में मिशन के सफल होने के टीवी प्रसारण को वे बिजली कट जाने के कारण देख नहीं पाते। वर्षा पिल्लई (नित्या मेनन )के घर एडजस्टमेंट की बात हो या नेहा सिद्दिकी ( कृति कुल्हारी) का मकान मालिक से बातचीत का दृश्य या विद्या बालन का उसके सुपुत्र द्वारा ``its time to change the god'' कहने के बाद की प्रतिक्रिया या अक्षय कुमार का कम स्पेस में ज्यादा साइंस, छलांग लगाने के दृश्य के बाद का वार्तालाप
विद्या बालन का आदर्श कामकाजी गृहणी के पात्र द्वारा अपने सुपुत्र को मंगल पर जाने की प्रक्रिया समझाने (जिसे कोई भी आम आदमी समझ सकता है); पूरी से प्रक्षेपण(Projection) का विचार आने (जिसे दिलीप ताहिल का पात्र रूपर्ट पूरी साइंस कहता है); अनंत अयंगर (एच जी दत्तात्रेय) को प्लास्टिक से आइडिया मिलने; एका गांधी (सोनाक्षी )को पाल वाले जहाज से प्रेरणा मिलने; क्लब के दृश्य के बाद ड्रीम शब्द से उत्साह भरने को देखकर लगता है कि हर व्यक्ति विशेषकर गृहणी वैज्ञानिक है। वास्तव में रोजमर्रा या जीवन की समस्याओं का समाधान हमारे आसपास की घटनाओं में ही है। बस, हमें वैज्ञानिक /सुलझे हुए दृष्टिकोण व अंतर्दृष्टि की आवश्यकता है ।सभी कलाकारों ने दमदार अभिनय किया है। दिलीप ताहिल समय के साथ और अ(NASA)वान लगने लगे हैं, निखरने लगे हैं। उनका पात्र एक ऐसे जिद्दी बच्चे की तरह लगता है जिसको सिर्फ अपना खिलौना पसंद है बाँकी का तोड़ देता है। परंतु बड़े होने पर वह समझदार हो जाता है। यह भी सच्चाई है कि हर संस्थान में एक निराशावादी,ताना बाज होता ही है ।
सोनाक्षी की महत्वाकांक्षा उन्हें संगठन परिवर्तन तो विद्या के सुपुत्र की महत्वाकांक्षा उन्हें धर्म परिवर्तन की ओर ले जाते हैं वहीं परमेश्वर जोशी(शरमन) पर मंगल भारी है(जैसा ज्योतिषी ने बताया)। जो पिछलग्गू होने जैसा है ।परंतु अपनी मौलिकता को पहचानकर,सीमित संसाधनों व अपने बनाए रास्तों से मिली सफलता का आत्म संतोष उन्हें महत्वाकांक्षा पूर्ति से ऊपर उठाकर मौलिक कार्य के महात्म्य तक ला देती है। हम अपने समाज,संस्थान, संगठन,धर्म, संस्कृति, देश को गरियाते रहने और छोड़ने के बजाय सकारात्मक परिवर्तन में थोड़ा भी मौलिक योगदान दें तो हम अपने साथ-साथ बहुतों का भला करने के आत्मसंतोष का सुख प्राप्त कर सकते हैं ।क्योंकि कमियाँ हर कहीं हैं।
परंतु !''आराम से आइए बहुत समय है" मंगल विभाग के कमरे (मंगल भवन )में अक्षय कुमार का दिया गया ये बयान हमारी कार्यप्रणाली को उजागर करती लगती है। हम सूर्य/ रोशनी /चेतना /जागरण से दूर मंगल या बृहस्पति या अन्य किसी ऐसे ग्रह पर हैं जहां समय और कार्य की गति धीमी है ।जहां बस समय काटना है। फिल्म में वर्तमान परिवेश में बच्चों की परवरिश ;महिला के शोषित, स्वतंत्र और समन्वयात्मक स्वरूप को भी प्रमुखता से दिखाया गया है। 'ऐसे विज्ञान का क्या फायदा जो देश के काम ना आए'; ''फट जाएगी सबकी''; ''तुम वर्जिन हो ना '';''पेपर डोसा" ''उंssह बीपी लो है' जैसे संवाद व अदायगी कुछ समय तक दिमाग में घूमते रहेंगे ।कॉन्फ्रेंस हॉल का दृश्य जहां अक्षय कुमार फंड मांगने आते हैं;तापसी व जीशान के बीच वार्तालाप का दृश्य, मार्मिक बन पड़े है। अक्षय का मंगल भवन में अकेले बड़बड़ाना और बिल्ली का आना अपने लक्ष्य और विरासत के प्रति हमारी उदासीनता का प्रतीक लगता है ।जो गंभीर सह मजेदार दृश्य है ।प्रारंभ में असहमति, असहयोग, अनमनापन बाद में सहमति, सहयोग,उत्साही प्रवृत्ति प्रायः सभी दल या लक्ष्य आधारित फिल्मों में होता है।इसमें भी है। परंतु घिसा-पिटा दृश्य नहीं। मिशन मंगल की सफलता निश्चित तौर पर हमारे देश के लिए गर्व व उपलब्धि का विषय है। आगे और पत्थर उछालने हैं (शायर दुष्यंत कुमार के शब्दों मे) इसरो और फिल्म निर्माण का पूरा दल बधाई और शुभ कामनाओं के पात्र हैं जिन्होंने एक किफायती मंगल मिशन तैयार किया जो हमारे विचार और आनंद को तनावमुक्त ग्रह /ऊंचाइयों पर ले जाते हैं।
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