SHERSHAAH Movie Review शेरशाह फिल्म समीक्षा

 “अपने देश से बड़ा कोई धर्म नहीं होता” शेरशाह फिल्म का यह अंतिम संवाद ही परमवीर चक्र कैप्टन विक्रम बत्रा के जीवन का मूल मंत्र रहा है। इस संवाद के बाद कैप्टन बत्रा का वास्तविक साक्षात्कार (interview) भी दिखाया गया है,जिसमें वे भारत माता के सबसे खुशमिजाज, सबसे जांबाज, दुश्मनों को विकट युद्ध परिस्थिति में हंसकर चुनौती देने व स्वीकारने वाले शेर दिखते हैं। शेरशाह कैप्टन बत्रा को 1999 के कारगिल युद्ध में दिए गए ऑपरेशन (सैन्य धावा) का कूट(Code) नाम था। 25 वर्षीय अमर शहीद परमवीर कैप्टन बत्रा जैसे योद्धाओं के लिए ही 12वीं शताब्दी में वीरगाथा कालीन कवि जगनिक ने परमाल रासो के आल्हा खंड में लिखा है –

“बारह बरिस(वर्ष) ले कुकर (कुत्ता) जिऐं, 

औ तेरह लै जिऐं सियार,

बरिस अठारह छत्री (योद्धा) जिऐं,

आगे जीवन को धिक्कार”

 यहां पर छत्री(क्षत्रिय) का अर्थ रणबांकुरों,योद्धाओं,सैनिकों से है। आधुनिक काल में भारत के सनातन समाज को जाति के नाम पर भड़काने वाले इस देश के दुश्मन समझ लें कि-निसंदेह एक कालखंड में भारत में कर्म आधारित व्यवस्था जन्म आधारित होकर घृणित हो गई थी और कई समुदायों के साथ अन्याय व शोषण हुए। परंतु वर्तमान में कानून का राज है और अगर किसी के साथ भी, कोई भी, किसी भी रूप में भेदभाव, अन्याय, शोषण करता है तो कानून में उसके बराबर सजा का प्रावधान है। इसलिए पुराने समय में हुई गलतियों का जिक्र करके कुछ विभाजन कारी लोग अपने राजनैतिक हित साधने, व्यक्तिगत कुंठाओं के कारण या अपने संप्रदाय,पंथ, मत में शामिल करने के लिए जातिवादी बातों को बढ़ावा दे रहे हैं ताकि सनातन भारतीय समाज टूट जाए। ऐसे लोग झूठी खबरों और मनगढ़ंत तर्कों, सबूतों का सहारा लेकर अपनी विभाजनकारी बातों पर कायम रहते हैं। 

परमवीर चक्र कैप्टन बत्रा, परमवीर चक्र अब्दुल हमीद (1965 युद्ध) आदि अनेक क्षत्रिय भारत माता के दुलारे, लाडले वीर सपूतों का बलिदान भारतीय समाज को अखंड एकजुट और सुरक्षित रखने के लिए है। आपस में लड़ने के लिए नहीं। समस्त स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों, देश के समस्त वर्तमान व भूतपूर्व सैनिकों, सभी सुरक्षा बल व विभाग, प्राचीन काल में बाह्य आक्रांताओं से भारत भूमि और भारतीय परंपरा की रक्षा करने वाले समस्त वीरों ने अखंड भारत की संकल्पना के साथ अपना बलिदान दिया। इसमें सभी जाति,समुदाय,क्षेत्र के वीर शामिल हैं। क्या हम इतने गिरे हुए, एहसान-फरामोश, कृतघ्न हैं कि स्वतंत्र भारत में एक बेबुनियाद और टुच्चे से बहकावे में आकर,अपना विवेक खोकर एक दूसरे को हजारों वर्ष पुरानी बातों के लिए गाली दे? झगड़ा करें?विभाजित हो जाएं? कुछ परम मूर्ख लोग  आम जीवन और सोशल मीडिया में स्वयं को शेर बताने का प्रयास करते हैं, ऐसे लोगों को हमारे एक मित्र की सलाह है– "किसी भी आधार पर अपने आपको शेर समझते हो तो अपना करतब दुश्मन देश में जा के दिखाओ"

 कैप्टन बत्रा के सैन्य धावा के सफलता का कूट संदेश होता है- “ये दिल मांगे मोर (more/अधिक)” अर्थात तब तक नहीं रुकना जब तक मातृभूमि में एक भी दुश्मन हो। अमर शहीद भगत सिंह-राजगुरु-सुखदेव-आजाद आदि ने जैसे हंसते-हंसते अपनी आहुति दी थी। कैप्टन बत्रा के शौर्य में यही बलिदानी दिखती है। आज के स्वतंत्र व निरंतर अधिक शक्तिशाली होते भारत को सैन्य ताकत से हराना नामुमकिन है। पर, क्या हो? जब भारत की संताने ही उसे हराने-तोड़ने पर आमादा हो और उन्हें देश के दुश्मनों से बढ़ावा मिलता हो। कुछ उग्रवादी संगठन निरंतर हिंसक वारदातें करके आंतरिक विभाजन और अशांति पैदा करते रहते हैं। उनका आधारहीन तर्क है कि- उनका आंदोलन आम जनता के लिए है और जो उनकी बात नहीं मानेंगे उन्हें वह मार देंगे। अगर वास्तव में उनके पास  मजबूत कल्याणकारी वैचारिक आधार है तो उस विचार के साथ जनता के बीच जाएं, उन्हें जागरूक करें, तथा चुनाव लड़ कर जीतें, नीतियां बनाएं, जनता की सेवा करें। परंतु वे ऐसा नहीं करेंगे। नहीं करते। क्योंकि उन्हें ना तो लोकतंत्र की समझ है ना स्वतंत्रता व अखंडता का आदर है। 

भारतीय सेना के अदम्य साहस व शौर्य पर तथा देशभक्ति से ओतप्रोत अनेक फिल्में बनी है। ‘द लीजेंड ऑफ भगत सिंह’; बॉर्डर; चक दे इंडिया; ए वेडनेसडे; हॉलीडे; क्रांति; सरफरोश आदि आदि। लीजेंड ऑफ भगत सिंह का संवाद –“एक बार देश के लिए मर जाऊं फिर चैन से जी लूंगा” या बॉर्डर का संवाद-“हम इतने नालायक बेटे भी नहीं है साहब कि हमारी मां के सीने पर कोई कदम रखें और हम कुछ ना करें” या वेडनेसडे फिल्म का संवाद-“मेरे घर में कॉकरोच घुस आए हैं, मैं साफ कर रहा हूं” विभिन्न परिस्थितियों में मातृभूमि के प्रति कुछ कर गुजरने की तमन्ना का परिचायक है। विविधता भरे मेरे देश में एकता बनाए रखने के लिए यह आवश्यक है कि राष्ट्र प्रथम की अवधारणा सदैव सामने रखें। धर्म,जाति,संप्रदाय, भाषा,क्षेत्र आदि आधार पर कट्टर बन जाने से देश की विविधता और एकता दोनों खतरे में पड़ जाएगी। तब मातृभूमि को बाहरी दुश्मन से खतरा नहीं होगा और कैप्टन बत्रा जैसे तमाम शहीदों की बलिदानी व्यर्थ हो जाएगी। यह समय  भारतीय समाज को एक करने का है। ऐसे सूत्रों की खोज करने का है जो हम सबको जोड़ता है और सनातन भारतीय संस्कृति (वसुधैव कुटुंबकम,एकम सत विप्रा बहुधा वदन्ति) के विचार को प्रसारित करने का है।ना कि ऐसी बातों को करने का जो समाज को विभाजित करता है। इसी विभाजन कारी मानसिकता के कारण 1947 में और उससे पहले भी भारत कई खंडों में टूट चुका है।

सिद्धार्थ मल्होत्रा ने कैप्टन बत्रा के ऊर्जावान, शौर्य पूर्ण, बलिदान के लिए तत्पर चरित्र को बखूबी निभाया है। जिस तरह “उरी” फिल्म में विक्की कौशल ने दमदार अभिनय किया था। सिद्धार्थ मल्होत्रा इस फिल्म में निखर गए हैं। इसी तरह मनोज बाजपाई की फैमिली मैन वेब सीरीज शानदार है।शेरशाह फिल्म के पहले दृश्य में कैप्टन बत्रा अपने एक साथी द्वारा यह कहे जाने पर कि-“हम सब मारे जाएंगे साहब” कैप्टन बत्रा घनघोर युद्ध के लिए अकेले ग्रेनेड का पिन निकाल कर दुश्मन की गोलियों के सामने सीना तान कर….. “तुम्हारी मां की…. कहते हुए एक शेर की तरह झपट पड़ते हैं। इसी तरह फिल्म लीजेंड ऑफ भगत सिंह का वह दृश्य बेहद मार्मिक है जब आजाद मिट्टी उठाकर ‘मुझे माफ करना मां मैं इतनी ही सेवा कर सका’ कह कर खुद को गोली मार लेते हैं। हाल ही में आई बेलबाटम फिल्म का “रॉ वही बाप है” वाला दृश्य नेता की बोलती बंद कर देता है। बेबी फिल्म में दरवाजा बंद करके नौकरशाह को थप्पड़ मारे जाने का दृश्य हो या चक दे इंडिया में कोच कबीर खान का खिलाड़ियों से परिचय वाला दृश्य हो या उरी फिल्म का “बलिदान परम धर्म:” का नाद हो जिसको सुनकर दुश्मन की पैंट गीली हो जाने का संवाद है। अमित साध अभिनीत अवरोध वेब सीरीज आदि अनेक नई पुरानी राष्ट्र प्रथम की अवधारणा वाली कहानियां मनोरंजन के साथ चिंतन मनन और प्रेरणा के लिए उपलब्ध है। सम्माननीय डिंपल चीमा जी जिनसे कैप्टन बत्रा का विवाह होने वाला था आज भी अविवाहित हैं। पाकिस्तान जैसे आतंकी,घुसपैठिए व दुश्मन देश में यही नारा गूंजता है- “लड़- लड़ के लिया है पाकिस्तान हंस-हंस कर लेंगे हिंदुस्तान” अगर हम आपसी मूर्खतापूर्ण, गड़े मुर्दे वाली लड़ाई करते रहे तो सचमुच कई आतंकी घुसपैठिए हंसते हुए भारत के विभाजित होने का सपना देख रहे होंगे। अब समय आ गया है हर उस आदमी के खिलाफ, विचार के खिलाफ खड़े होने का जो किसी भी रूप में भारतीयता को खंडित करना चाहता है। 


पुरोनी(छत्तीसगढ़ी शब्द/extra notes)- तमिल फिल्म निर्देशक विष्णुवर्धन कुलशेखरन जी का यह प्रथम हिंदी फिल्म है और पूरे फिल्म को सजग होकर कसावट के साथ निर्देशित किया गया है। फिल्म का संगीत मधुर है।यह फिल्म अमेजॉन प्राइम पर उपलब्ध है। फिल्म प्रेमियों को इसे अवश्य देखना चाहिए।


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Comments

  1. Bahut shandar mitra.. keep posting more reviews. God bless you bhai.

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