777 Charlie चार्ली - Movie Review फ़िल्म समीक्षा

 मात्र स्वयं से प्रेम करते हुए किसी और ( इस फिल्म में चार्ली ) से प्रेम करना फिर प्रेम का भीतर उतरना अर्थात प्रेममय  होना सबसे प्रेम करना। एक प्रकार से एक भोगी का योगी बन जाना, सांसारिकता से आध्यात्मिक मार्ग पर चलना इस फिल्म के शुभ व सूक्ष्म  संकेत हैं।  आपने राजा भर्तृहरि की कहानी शायद सुनी हो। धर्मा(रक्षित शेट्टी) अपना जीवन एक ढर्रे  में जी रहा है। रोज सुबह अलार्म से पहले उठ जाना, वही सिगरेट, वही टीवी शो, वहीं इडली, वही गंदगी, वही बीयर, वही अस्त-व्यस्तता, वही अतीत का कोलाहल। अचानक एक दिन चार्ली (एक श्वान/Dog) उसके जीवन में आती है। वह भी प्रताड़ित होकर आई है।  चार्ली और धर्मा के करीब आने के सभी दृश्य आनंददायक और कमाल के हैं। धर्मा अपने ढर्रे के कारण ही चार्ली को अनजाने में अपना पालतू बना लेता है। फिल्म में डायलॉगबाजी नहीं है। दृश्य संवेदना ही फिल्म को उच्च श्रेणी का बनाती है। धर्मा के घर के सामने रहने वाली बच्ची (शरवरी) चार्ली के कारण ही धर्मा पर विश्वास करने लगी है, वरना वह धर्मा से बहुत डरती थी। धर्मा ज्यादातर मौन ही रहता है और उसके मौन को चार्ली, नाश्ते (इडली, सिगरेट आदि) की टपरी वाली बूढ़ी अम्मा पढ़ लेती है। बूढ़ी अम्मा(भार्गवी नारायण) व उनके पति(एच जी सोमशेखर) अपने विदेश गए बेटे के फोन के इंतज़ार में आज स्मार्टफोन के जमाने में भी पुराना फोन ठीक करवा रहे हैं।  बूढ़ी अम्मा का किरदार छोटा है परंतु उसका प्रभाव बहुत गहरा है जैसे -रीतिकालीन कवि "बिहारी" के दोहे होते हैं। 

पहले तो धर्मा चार्ली से पीछा छुड़ाना चाहता है और जब उसे एहसास होता है कि चार्ली को अपने से दूर नहीं करना चाहिए था, तब भी, वह कुछ नहीं बोलता। इधर, तब तक चार्ली धर्मा के पास आने का पूरा इंतजाम कर चुकी होती है। दृश्य मजेदार व संवेदना से भरे हुए हैं। फिल्म में पशु कल्याण विभाग की अधिकारी (सविता श्रृंगेरी), पशु चिकित्सक (राज बी शेट्टी) के साथ भी मजेदार दृश्य है। पालतू पशु जैसे- श्वान, गाय जब आपसे प्रेम करते हैं तो उनके प्रेम प्रदर्शन का तरीका अलग, निराला ही होता है। दो-चार दिन, बस दो-चार दिन, आप उन्हें खाने को दे दीजिए, फिर देखिए वे कैसा प्रेम बरसाते हैं। इंसान बड़ा होकर सांसारिकता में जकड़कर कृतघ्न(Thankless) हो जाता है। ये पालतू अपनी मृत्यु तक आपसे प्रेम ही करते हैं। वर्तमान की ऐसी कई कहानियां व घटनाएँ हैं जिसमें श्वान ने लोगों की कई जानें बचाई है। अभी हाल ही की घटना है भारतीय थल सेना का एक सिपाही श्वान "ज़ूम" दो गोली लगने के बावजूद आतंकी को नहीं छोड़ा और इलाज़ के दौरान जूम शहीद हो गया।श्रद्धांजलि!

एक समय के बाद धर्मा भी चार्ली की भाषा समझने लगता है। मध्यांतर के बाद धर्मा 'कनफटे साधुओं' (आध्यात्मिक/योग परंपरा में साधुओं की एक शाखा, भगवान/गुरु दत्तात्रेय के शिष्य परंपरा में) की तरह चार्ली को लिए-लिए फिरते हैं। कनफटे साधु आज भी आपने आध्यात्मिक मार्ग में हमेशा एक काला श्वान अपने साथ रखते हैं, वे इनको को अपने कंधे पर लाद कर चलते हैं, एक पथ प्रदर्शक की तरह। सनातन आध्यात्मिक धारा के बहुत सारे प्रतीक शास्त्र, और प्रतीक दृश्य हैं, जिन्हें आज हम अपनी नादानी में मात्र कहानी या गल्प समझ लेते हैं, परंतु इनका बेहद गहरा और व्यापक अर्थ है।

 बहरहाल, धर्मा चार्ली के साथ आध्यात्मिक यात्रा में निकला हुआ प्रतीत होता है। ध्यान रहे भारत में विभिन्न माध्यमों से हर युग में बताया गया है कि-आध्यात्मिक यात्रा भीतरी होती है ना कि बाहरी- सड़क, वायु, जल में लंबी दूरी तय करना। आध्यात्मिक यात्रा में आंतरिक बदलाव आते हैं, मसलन धर्मा चार्ली के लिए अपने कई प्रिय चीजों को त्याग देता है। आठवीं-नवमी शताब्दी से पहले भारत में कई स्त्री-पुरुष अपना सब कुछ त्याग कर आध्यात्मिक मार्ग में मुक्ति के लिए बस निकल पड़ते थे। कहीं भी ठहर जाते थे, जो मिलता था खा लेते थे। उस समय आम जनता उनका सम्मान करती थी। उन सन्यासियों के हाव-भाव व आचरण ही ऐसे होते मानो उन्हें मुक्तावस्था की आंतरिक छटपटाहट है, आध्यात्मिक प्यास है। यही छटपटाहट धर्मा में भी है जो प्रत्येक सहृदय को द्रवित कर सकता है। वर्तमान में प्रत्येक क्षेत्र की भाँति आध्यात्मिक क्षेत्र में भी भ्रष्टाचार व्याप्त है। कई पाखंडी, साधु बने घूम रहें हैं, परंतु इस कारण सभी साधुओं को ढोंगी और पाखंडी समझना उचित नहीं। अभी भी कई सन्यासी इस मुक्तावस्था के लिए तपरत हैं। हम आम जनमानस में से अधिकांश लोग सिर्फ अपने मनोरंजन के लिए धार्मिक-आध्यात्मिक बातें करते हैं। भीतर आध्यात्मिक प्यास है ही नहीं। इस उदात्त सनातन आध्यात्मिक धारा की विशालता को, भारत की आध्यात्मिक खोज परंपरा को समझे बिना कुछ संकीर्ण, भेद-बुद्धि वाले पढ़े-लिखे लोग भी शिव, राम, कृष्ण, बुद्ध, महावीर, नानक, कबीर, छत्तीसगढ़ में गुरु घासीदास आदि पूजनीय देवताओं व संतो को एक दूसरे के खिलाफ बता कर समाज में विभाजन पैदा कर रहे हैं, जबकि इन सभी का संदेश व आचरण समस्त मानव की मुक्ति के लिए उसी आध्यात्मिक स्रोत की प्रगतिशील, समयानुकूल धाराएँ हैं। जिसकी जैसी समझ, वैसा मुक्ति का मार्ग। कहा भी गया है-"जा की रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी।" खोजने वाला प्रकृति के हर कण, हर घटना से मुक्ति का मार्ग खोज सकता है,अपने बोध के अनुसार इसीलिए तो विश्व में इतने सारे आध्यात्मिक संप्रदाय हैं और भारत में सर्वाधिक देवी-देवता व पंथ पाए जाते हैं। भारत अपने अस्तित्व के दिन से ही तमाम मार्गों को पल्लवित होने का जरूरी वातावरण देता रहा है, कौन? कब शुरू किया? पता ही नहीं! बस, जारी है, इसीलिए तो इसे सनातन कहा गया है। सिर्फ मेरा ही मार्ग सबसे अच्छा है बाकी बेकार कहने वाले विभाजनकारी लोग ना तो आध्यात्म को समझ पाए हैं और ना ही भारत को। 

आध्यात्मिक मार्ग पर चलने से संबंधित या आध्यात्मिक मार्ग का संकेत देने वाली कई फिल्में बनी है। फिल्म 'गाइड' (आर के नारायण, मालगुडी डेज़ के लेखक के उपन्यास पर आधारित) में एस डी बर्मन साहब का गाया हुआ -"वहां कौन है तेरा मुसाफिर जाएगा कहां..." देवानंद का स्वयं से संवाद व पूरी फ़िल्म  पर्याप्त आध्यात्मिक संकेत देते हैं। गुरुदत्त के प्यासा में नायक का व्यक्तित्व और तलाश। हॉलीवुड की मैट्रिक्स श्रृंखला' और स्कारलेट जॉनसन अभिनीत 2014 में आई फिल्म LUCY', क्रिस्टोफर नोलन की इंटरस्टेलर अनेक अध्यात्मिक संकेतों,आयामों की बात करते हैं। ऐसी कई फिल्में हैं जिन्हें देखकर लगता है कि- श्रीमद्भगवदगीता की व्याख्या दृश्यों में की जा रही है-"यहाँ सब कुछ क्षणिक और नश्वर है" आदि.... जीवन भी प्रतिपल यही संकेत देता है, पर हम जैसे आम लोग अहंकार में डूब कर कहाँ समझ पाते हैं, समझाने के लिए कृष्ण को धरती पर आना पड़ता है। यह फिल्म आध्यात्मिक मार्ग का संकेत मात्र देती है। स्वयं से अधिक हो जाने का। अब धर्मा स्वयं के लिए मायने नहीं रखता, वह आत्म (स्वयं) से परे चला गया है। बस, यही आध्यात्मिक मार्ग है। यहां फिल्म के दृश्यों का वर्णन कर देना,देखने व अनुभूत करने का आनंद खराब कर सकता है। फिल्म के कई दृश्य बेहद मार्मिक हैं। डॉग शो वाला दृश्य अपने आप में परिपूर्ण है। फिल्म के श्वान प्रशिक्षक,निर्देशक किरण राज के, सिनेमैटोग्राफर व कैमरामैन, समस्त कलाकार हार्दिक बधाई के पात्र हैं।  धर्मा और चार्ली के इस सफर में सभी उम्र के फिल्म प्रेमी भाग लेकर अपने हिस्से का बोध पा सकते हैं। 

 पुरोनी (छत्तीसगढ़ी शब्द)Extra Notes- भारत में विद्यार्थी के आदर्श गुण कहते हुए "श्वान निद्रा" का भी जिक्र आता है। अगर आपके घर में या आसपास पालतू श्वान है और तमाम शोर-शराबे के बाद भी सोया हुआ है, तो, अधिक संभावना है कि वह श्वान बीमार है। कृपया पर्याप्त ख्याल रखें। जिन भारतीय बच्चों ने कॉमिक्स पढ़ा है वे "डोगा" को कैसे भूल सकते हैं। 

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