KANTARA - Movie Review कांतारा - फ़िल्म समीक्षा
कांतारा (हिन्दी अर्थ-रहस्यमयी वन) फिल्म का अंतिम भाग अपने भीतर के बीहड़ में खोज के लिए रहस्य सूत्र उपलब्ध कराता है। यह फिल्म महान भक्त कवि सूरदास (1478 से1583 ई) के दृष्टिकूट और कबीरदास (1398 से 1494 के आसपास) के रहस्यवादी पदों की तरह रची गई है। फिल्म रूढ़ और प्रतीक चिन्हों से सराबोर है,जैसा कि दृष्टिकूट पदों में होता है। फिल्म की कहानी शिव, पार्वती, विष्णु, पंजुरलि,गुलिगा देवों के पौराणिक कथानक(Mythology)सेअंकुरित; अभिनेता, निर्देशक व पटकथा लेखक ऋषभ शेट्टी(वास्तविक नाम-प्रशांत शेट्टी) व उनके दल के तप से पल्लवित आधुनिक सिनेमाई वन का विशाल वृक्ष है, जो सघन बेल-बूटों से ढंका हुआ है। पंजुरलि देव( शासक /शांत/वराह जिसे शिवजी ने पृथ्वी पर भेजा), गुलिगा देव (क्षेत्रपाल/उग्र/शिव के ही द्वारा विष्णु की सेवा/रक्षा के लिए भेजे गए) के कथानक को जानने के बाद कांतारा का गहरा आध्यात्मिक रहस्य सामने आता है।
जब तक पृष्ठभूमि/जड़ों से नाता न हो इस सिनेमाई वनवृक्ष और दृष्टिकूट पदों के मर्म को समझा नहीं जा सकता या यूं कहें कि भारतीय आध्यात्मिक परंपरा, जीवन दर्शन को समझे बिना कांतारा के रहस्यमयी श्रृंखला सूत्र का एक भी गांठ नहीं खोला जा सकता।
फिल्म की कहानी एक राजा के पास सब कुछ होते हुए भी अशांत होने और शांति की तलाश में निकलने से प्रारंभ होती है। उस असीम शांति की अनुभूति प्रकृति/ वनदेवी के गोद में जड़ित देवमूर्ति (फिल्म के खलनायक की भाषा में-पत्थर) में उन्हें दिखता है। दैवमूर्ति को अपने घर ले जाने के लिए राजा उस दैवभूमि से सहर्ष अपना अधिकार त्याग देता है। वह कौन सी भाषा है? अनुभूति, तरंग या प्रभाव है? जिससे एक देव मूर्ति के दर्शन मात्र से संपन्न और अशांत राजा ज़मीन त्यागकर असीम शांति व आनंद की अनुभूति करता है। शायद यही रहस्यमयी भाषा आध्यात्म है। आज भी भारतीय अपने इष्ट/ देवमूर्ति का दर्शन,पूजा व स्मरण कर शांति व आनंद पाते हैं। कोई देवमूर्ति के दर्शन या पूजा किस भाव से करता है? क्या पाता है? वह उनसे किस भाषा में बात करता है?यह उसके व देवमूर्ति/प्रतीक/ चिन्ह/इष्ट के बीच का रहस्य है जिसे कोई अन्य ठीक उसी रूप में कभी नहीं समझ पाता। अन्य लोग अपने अपने हिसाब से बस कयास लगा सकते हैं या आलोचना कर सकते हैं। शायद जब जीव, प्रकृति या ब्रह्माण्ड के स्रोत से कृतज्ञ होकर बात करना चाहता है तो वे आपस में इसी दृष्टिकूट भाषा में बात करते हैं। अन्य आदमी उसकी व्याख्या अपनी समझ के आधार पर ही करता है, जैसा कि- फिल्म का खलनायक अपने पूर्वज व दैव के संबंध में अपने बेटे को अपने कल्पना की कहानी सुनाता है वह वास्तविक घटनाक्रम को स्वीकार नहीं कर पाता। महान संत कवि कबीर की भाषा में खलनायक ने “घूंघट का पट नहीं खोला” । शायद यही वह रहस्यमयी आध्यात्मिक भाषा है कि- किसी को शिव का तांडव, भोलापन व मदहोशी का विरोधाभास (इस फिल्म के शिवा की तरह) समझ में आता है, किसी को प्रतिकूल परिस्थितियों में राम का मर्यादा पुरुषोत्तम होना, किसी को युद्ध भूमि में भगवान कृष्ण का गीतोपदेश, किसी को मां आदिशक्ति के विभिन्न रूप समझ में आते हैं,किसी को भगवान महावीर का कैवल्य, किसी को भगवान बुद्ध का मौन, किसी को आचार्य शंकर का अहम् ब्रह्मास्मि व जगत मिथ्या, किसी को गुरुनानकदेव जी का एक ओंकार,किसी को कबीर जैसे संतों का रहस्यवाद (छत्तीसगढ़ में गुरु घासीदास) तो किसी को मीरा, सूर, तुलसी, रसखान आदि की भक्ति, किसी को अपने पूर्वज, किसी को प्रकृति की भाषा अपने-अपने तरीके से समझ आती है। भाषा वही रहस्यमयी आध्यात्मिक भाषा है। फिल्म का संवाद –“कान लगाकर सुन जंगल कुछ कहता है” शायद इसी रहस्य के बारे में है। किसी को ये सभी समझ में आते हैं तो किसी को इनमें से कोई भाषा समझ नहीं आती और उनकी अपनी अलग भाषा है। व्यक्तिगत समझ के अनुरूप व्यवहार करने और सम्मानजनक तरीके से बात करने तक कभी कोई टकराव उत्पन्न नहीं होता।टकराव तभी होता है जब कोई एक अपनी समझ के अलावा दूसरे के लिए अपशब्द कहता है, नीचा दिखाता है। विविधता भारतीयता के जड़ में है इसीलिए उदात्त भारतीय आध्यात्मिक परंपरा समन्वयवादी है। आशा है एक दिन हर भारतीय इस आध्यात्मिक भाषा की एकता को समझेंगे और एक दूसरे की समझ पर कीचड़ नहीं उछालेंगे। हर प्रकार के विभाजनकारी मानसिकता को त्याग देंगे। विज्ञान भी सृष्टि के रहस्य को सुलझाने में प्रयासरत है। मनुष्य हर ओर से समझ विकसित करने में संलग्न है ये बहुत अच्छी बात है।फिल्म के पात्र,उनके नाम, स्थान व घटनाक्रम भी प्रतीकात्मक है। नायक शिवा=शिव,डीएफओ मुरलीधर (किशोर कुमार) =कृष्ण या विष्णु, खलनायक देवेंद्र(अजीत कुमार)= इंद्रियों के वशीभूत/वासना से संचालित/स्वार्थी, कैलासा= कैलाश (शिवा का निवास स्थान जो एक ऊंचे पेड़ की शाखाओं पर बनाया गया है)। पंजुरलि दैव व गुलिगा दैव के आपसी टकराव तथा वनदेवी के हस्तक्षेप से उनके एकत्व की पौराणिक कथा को शिवा व मुरली के बीच टकराव फिर बाद में एकत्व से दर्शाया गया है। फिल्म के शुरुआत में त्यागे गए तलवार से खलनायक का वध, रामपा का दोनों ओर चलने वाला बंदूक आदि।नायक शिवा को दैव की रहस्यमयी वाणी/नाद (वोSSऊSSS…) जब भी सुनाई देता है उसे कंपकंपी के साथ बुखार आ जाता है ऐसे मे वो कहीं भी रहे अपनी माँ के पास घर आता है। फिल्म के 90% हिस्से तक शिवा, मुरली व देवेंद्र का पात्र विरोधाभासी लगते हैं। मारनेवाला, बचानेवाला और बचानेवाला, मारनेवाला लगता है। नायक मदहोशी व समुदाय कल्याण का विरोधाभासी जीवन जी रहा होता है, अंधेरे में,भ्रमित रहता है। सच्चाई पता चलने पर जब उससे वराह रूप की उपस्थिति का एहसास होता है तब, वह खलनायक के घर जाकर कहता है “मैं शुद्ध होकर आया हूं”। ‘वाराह रूपम’ गाना व पारंपरिक ‘भूताकोला’(दैवीय आत्मा का अवतरण) का नृत्य/प्रदर्शन अद्भुत अनुभूति देता है। शिवा को प्रकृति ने‘कोला’ के लिए चुना था, इससे पहले उनके पिता यह करते थे। जब शिवा भोग में व्यस्त था दैव उसे बीच-बीच में दर्शन या नाद देकर एहसास कराने का प्रयास करते। जब शिवा शुद्ध (भोग से मुक्त) हो जाता है तो ही अंत में शिवा के मृत्तप्राय शरीर पर दैव अवतरित होते हैं। यह दृश्य बेहद प्रभावी है! ऐसा लगता है जैसे इस दृश्य के फिल्मांकन के समय पात्रों ने इसे सचमुच महसूस किया है। ऋषभ शेट्टी ने पूर्ण अनुभूति से काम किया है। जैसे ही उन वनवासी समुदाय पर विपत्ति आती है या कोई कुदृष्टि डालता है, उस क्षेत्र की रक्षा के लिए दैव चुने गए शरीर पर अवतरित होते हैं। जैसे रामायण के कथानुसार भगवान राम ने वनवास के दौरान राक्षसों से रक्षा कर वनवासियों का कल्याण किया और वनवासियों की सेना बनाकर रावण का संहार किया। भारत में इसी आस्था/मान्यता/अनुभूति के आधार पर स्थान-स्थान पर विभिन्न रूपों और नामों से उर्जा रूप को मूर्तियों/चिन्हों में इस तरह प्राण-प्रतिष्ठित किया गया है कि,वे उस स्थानीय क्षेत्र अथवा समुदाय का कल्याण करें,शांति व आनंद कायम रखें, संकट के समय उनका आह्वान करने पर किसी ना किसी रूप में रक्षा करें। इसीलिए भारत में कुलदेवता, पूर्वजपूजा, ग्राम देवता,शीतला माता, वन/प्रकृति देवी, आदि तमाम देवी-देवताओं के विभिन्न रूप व नाम के मंदिर या पूजा स्थल पाए जाते हैं। इन सभी देवी-देवताओं का संबंध पौराणिक कथाओं में कहीं न कहीं जाकर भगवान शिव, विष्णु, ब्रह्मा या माता आदिशक्ति से निकल ही आता है। भाषा वही है बस प्रत्येक व्यक्ति/समुदाय/पंथ उनकी अपने समझ के साथ व्याख्या प्रस्तुत करता है। यह भी सत्य है कि आध्यात्मिक/भक्ति के साथ-साथ आडंबर, पाखंड व शोषण भी समाज में आए जैसे कि हर अच्छे चीज के साथ कुछ बुरा आता है। इस बुराई को मिटाना भी जरूरी है और आज हम इस स्थिति में हैं कि समन्वय को अपना कर विभाजनकारी मानसिकता को त्याग कर इन बुराइयों से मुक्ति पा सकते हैं। सनातन दर्शन में ब्रह्म(सृष्टि का स्त्रोत/परमात्मा) एक ही है परंतु ब्रह्मांड/ जीवन के व्यवस्था के अनुसार इनके चार प्रमुख आयाम कहे जाते हैं-
1)सृजन/जन्म/उत्पत्ति = ब्रह्मा
2)पालन/पिंडकाल/जीवनकाल/ देहकाल= विष्णु
3)मृत्यु/विलीन/विनाश= महेश
4) इन सभी को संचालित करने वाली अनंत ऊर्जा तंत्र/आद्य चेतना शक्ति = मां आदिशक्ति
उपरोक्त आयामों को भी किसी शरीर या मूर्ति में अनुभूत कर अथवा अवतरित मानकर अनेक नाम दिए गए। दशावतारों में ‘वराह’ तीसरे अवतार हैं। कांतारा में दैव इन्हीं के रूप में हैं। दैव आगमन के पश्चात कल्याण करने तक शरीर में रहते हैं उसके बाद अपना उत्तराधिकारी चुनकर शिवा और उनके पिता की तरह वन/प्रकृति में विलीन हो जाते हैं, बस उनका गूंज/नाद (वोSSऊSSS…. वोSSऊSSS…. ) रह जाता है। अब प्रकृति/सृष्टि के स्रोत के इस गूंज/नाद का प्रत्येक सुनने वाला क्या अर्थ निकालेगा यह तो दैव ही जाने।
पुरोनी (छत्तीसगढ़ी शब्द)/Extra Notes – दृष्टिकूट/दृष्टकूट
पद- ऐसे पहेली जैसे पदरचना होते हैं जिसमें अर्थगूढ़ता/अर्थ के कई परत विद्यमान हो। जिसका अर्थ, वाचक(समान्य) अर्थ से नहीं समझ आता हो। अर्थ को उसके पृष्ठभूमि या उनके संदर्भित/रूढ़/प्रतीक अर्थों में ही समझा जा सकता है। पद देखने में कई बार एक दूसरे से असम्बद्ध, विरोधाभासी लगते हैं पर गहरे पानी पैठने की आवश्यकता होती है।
उदाहरण के लिए सूरदास जी का एक दृष्टिकूट पद रचना व व्याख्या
प्रस्तुत है--
कहत कत परदेसी की बात
(हे सखी अपने परदेशी पिया के बारे मे क्या कहूँ)
मंदिर(घर) अरध(आधा) अवधि(समयकाल) बधि हम सो
(घर का आधा भाग अर्थात पाख अर्थात एक पक्ष अर्थात कृष्ण
या शुक्ल पक्ष अर्थात 15 दिन में आएंगे ये हमसे कह गए थे)
हरि(सिंह) अहार(भोजन) चलि जात
(सिंह का आहार अर्थात मांस अर्थात मास अर्थात महीना बीता जा
रहा। यहाँ पर श्लेष अलंकार भी है कि- इंतज़ार में नायिका का माँस कम हो रहा अर्थात वो
दुबली हुई जा रही है)
वेद(4 वेद), नखत(27 नक्षत्र), ग्रह(9 ग्रह) जोरि(जोड़कर) अरध(आधा) कर
(4+27+9 को जोड़कर = 40 का आधा = बीस अर्थात विष/ज़हर बन गया है इंतज़ार)
सोई बनत अब खात
(अब यही प्रतीक्षा का विष पिये जा रहे हैं)
अस्वीकरण(DISCLAIMER)- पौराणिक कथाएँ प्रतिकात्मक शैली में लिखी गई है। व्याकरणगत, भाषागत,शैलीगत आदि आधार पर अर्थ के अनेक परत विद्धमान हैं। चूंकि ये बेहद प्राचीन हैं, समय के साथ - साथ प्रतीकों, व्याख्या, भाषा, प्रसंगों में अवश्य कुछ परिवर्तन हुए होंगे, कितना यह गहन शोध का विषय है। इन कथाओं को प्रत्येक व्यक्ति अपनी समझ, अनुभूति, अर्थग्रहणशीलता व मान्यतानुसार आंशिक या पूर्ण रूप से मानने या न मानने के लिए तथा स्वयं शोध के लिए स्वतंत्र है। इन कथाओं से व्यक्तिगत रूप में जीवनदर्शन, आध्यात्म, मनोरंजन या फंतासी या कुछ और भी ग्रहण किया जा सकता है।
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