विभाजनकारी Vs समन्वयवादी पार्ट 1


 आज देश में विभाजनकारी नहीं समन्वयात्मक विचारधारा की आवश्यकता है।वरना गृह युद्ध नजदीक है।

अगर हम दशावतारों के बारे में  पढ़ें तो पता चलता है उसमें मत्स्य से प्रारंभ होकर राम,कृष्ण, बुद्ध, कल्कि भी शामिल है। ये समन्वय का उच्चतम प्रयास है। मानस में शैव,वैष्णव और शाक्त का सुंदर समन्वय किया गया है। टकराव नहीं है।


मेरा, आपका  गांव, शहर, जिला, राज्य, देश,विश्व विविधताओं से भरा हुआ है कौन किसे पूजेगा मानेगा क्या करेगा यह उसकी व्यक्तिगत इच्छा है। एक ही जयंती या त्योहार को भारत के अलग अलग राज्यों में अलग अलग नाम से अलग समयों पर मनाया जाता है।ये विविध खूबसूरती सिर्फ भारत में दिखती है।

हम आप इतिहास को ठीक से पढ़ें तो यही पता चलता है कि भारत में विविध पंथ,दर्शन  एक साथ फले-फूले   भारत समन्वय का देश रहा है इसलिए इतने सारे पंथ, संप्रदाय विकसित हुए। यहां भारत में जिन्होंने यह कहा कि भगवान नहीं है या मैं नास्तिक हूं जैसे सबसे बड़े उदाहरण है चार्वाक उसको भी ऋषि या महर्षि चार्वाक कहा गया किसी ने उसका सर नहीं काटा, न ज़हर दिया। 

यह उदात्त भारतीय संस्कृति है।

हम आप जैसे पढ़े-लिखे लोग अगर एक दूसरे के परंपराओं के विरोध वाले चैट/मैसेज/वीडियो/लिंक भेजेंगे तो समाज में विभाजन ही पैदा होगा।  जबकि प्रत्येक उदात्त संस्कृति वाला भारतीय यही मानते हैं कि जो भी धर्म, पंथ,मार्ग भारत भूमि में उपजा फला फूला  अथवा राम,कृष्ण, बुद्ध, शिव, महावीर, नानक,सब एक ही हैं  जो इस भारत भूमि के किसी भी वंश में पैदा हुए या वे सभी भारत के प्रतिनिधि हैं।

 **उच्च स्तर पर ये सभी  वही एक बात बता रहे हैं–मानव मुक्ति का** 

इनको एक दूसरे का विरोधी बताते हैं यह हमारी मूर्खता या अज्ञानता है।

अब हम जैसे लोगों को न तो आध्यात्मिक प्यास है, न मुक्ति की इच्छा, न गहरे ज्ञान की कोई छटपटाहट है। **संत कबीर के शब्दों में- 'दशरथ सुत तिहुं लोक बखाना, राम नाम का मरम है आना। '** 

हमको मरम (मर्म) से कोई मतलब नहीं, बस व्यर्थ,फूहड़ मसालों की जुगाली कर रहे हैं। बस किसी तरह से चल रहा है। मेरा ही मार्ग सही है की कट्टरता इस जुगाली को मौखिक दस्त बना देता फिर इससे पीड़ित व्यक्ति कहीं भी कुछ भी रायता फैलाता है। 

देश में ऐतिहासिक रूप से बहुत कुछ अच्छा बुरा घटा है जितना ज्ञात है उससे कहीं ज्यादा अज्ञात है। शोषण, अन्याय,पाखंड हुए हैं। शिक्षा का प्रसार इसे खत्म कर रहा है।

 अब पढ़ लिखकर हम इतना तो कर ही सकते हैं कि  विविधता पूर्ण  भारतीय समाज में समन्वय का प्रयास करें।


**विनती **आज के इस इंटरनेट सोशल मीडिया के दौर में हर झूठ के समर्थन में हजारों कंटेंट और हर सच के विरोध में हजारों कंटेंट है इसलिए कुछ भी फॉरवर्ड या पोस्ट करने से पहले दो तीन वैध स्त्रोतों से प्रमाणित कर लें।


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