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Showing posts from September, 2021

CONTAGION(in reference with CORONA) MOVIE REVIEW कन्टेजियन(कोरोना के संदर्भ में) फिल्म समीक्षा

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 CONTAGION(in reference with CORONA) MOVIE REVIEW कन्टेजियन(कोरोना के संदर्भ में) फिल्म समीक्षा फिल्म अंधेरे में खांसने से प्रारंभ होता है। DAY-2 (संक्रमण  के दूसरे दिन) लिखाते  हुए संक्रमित महिला मिसेस एम्हाफ (ग्वेनेथ पल्ट्रोव)  दिखती है फोन में कुछ बात फिर सारा काम पार्श्व संगीत( जो की बेजोड़ है और पूरे फिल्में सुनाई पड़ती है ) और कैमरा हाल बयां करते हैं। कैमरा हर उस शख्स, हाथ, वस्तु को बारीकी से दिखाता है जिससे संक्रमण फैला। संक्रमित व्यक्ति जिसे छुआ विषाक्त (विषाणुमय) करता गया। Contagion  का अर्थ ही स्पर्श रोग संचार/छूत रोग संचार या उड़नी बीमारी है।ऑस्कर विजेता निर्देशक स्टीवन सोडरबर्ग ने "सार्स' का बारीक अध्ययन कर ये बनाया होगा।इनके अन्य निर्देशित फिल्म हैं- ट्रैफिक, ओशन 11,12,13; unsane, साइड इफेक्ट आदि। वर्तमान कोरोना कालखंड की जो भयावहता हम महसूस कर रहे हैं उसे इस फिल्म में देखा और समझा जा सकता है। मि. एम्हॉफ (मैट डेमन) को यकीन नहीं होता उसकी पत्नी और बेटा मर गए! कल तक तो सब ठीक था ।डॉक्टर किस वजह से जान गई है बता नहीं पाते हालांकि की बहुत सारी बीमारी का...

CHHICHHORE -MOVIE REVIEW छिछोरे- फिल्म समीक्षा"

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 CHHICHHORE -MOVIE REVIEW छिछोरे- फिल्म समीक्षा"  फिल्म की कहानी loser (हारनेवाले) से प्रारंभ होकर, लूजर वह होता है जो खुद से हार जाए और फिर योद्घा(fighter) होना मुख्य है हार जीत के मायने नहीं तक का सफर है। लूजर शब्द का प्रयोग कई बार हुआ है। छिछोरे (ओछा, नीच, मामूली कमीना,परेशान करने वाला/cheap,indecent,vulgar) शीर्षक दिया गया है।चूंकि ये कॉलेज छात्रावास में बिताए घटनाक्रम है उस समय लगभग हर विद्यार्थी ऐसे ही शैतानियां करता है।ऐसे में इसे छिछोरापन कहे तो उचित नहीं लगता। पात्रों का परिचय भी लूजर नंबर 1..2..3..4 आदि रूप में किया गया है। उच्च श्रेणी की संस्थाओं में जहां प्रतिभाशाली लोग ही जाते हैं एक ऐसा समूह अपने आप तैयार हो जाता है जिसे लूजर या नकारा मान लिया जाता है। यह आवारापन के कारण हो सकता है या अपने गुणों को अनदेखा करने के कारण हो सकता है। यह भी सच है कि वे भी बाद में एक सफल जीवन व्यतीत कर रहे होते हैं। खैर निर्देशक नितेश तिवारी जो स्वयं आईआईटी मुंबई के विद्यार्थी रहे हैं ने इंजीनियरिंग छात्रावास और छात्रों के जीवन की पश्चझलकियों (flashback) और वर्तमान को  बिल्कुल सली...

MUMBAI VARANASI EXPRESS SHORT FILM REVIEW ( Journey of Salvation) मुंबई वाराणसी एक्सप्रेस लघु फिल्म समीक्षा (मोक्ष यात्रा)

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इस एक्सप्रेस के जनरल डिब्बे नंबर दो में एक  कैंसर ग्रस्त बुजुर्ग मरीज कृष्णकांत झुनझुनवाला ( दर्शन जरीवाला) चढ़ता है जिसके कदम बमुश्किल उठते हैं, हाथ  ऊपर नहीं उठते जिसमें छड़ी है और मुंह में छाले। वह उस सीट में जाकर बैठता है जिसके सामने एक पेटू, खबड़ू ( बहुत खाने वाला) बातूनी पात्र सतीश सुतारिया( शेखर शुक्ला) पूरा चेहरा ढककर गुजराती अखबार पढ़ रहा होता है। मानो कृष्णकांत किसी से भी बात ना करना चाहता हो। चाहता हो उसे कोई देखे भी नहीं। सतीश भाई जब कहते हैं कहां जा रहे हो तो कृष्णकांत कहते हैं- काशी.. बनारस । सतीश कहते हैं काशी बनारस दोनों एक ही है अंकल.. और ट्रेन का नाम है मुंबई वाराणसी एक्सप्रेस..जिसको जो मन आए वही कहता है। संकेत यही है किसी भी नाम, किसी भी धर्म में रहो या रखो, कुछ भी कहो, भेद व्यक्तिगत है, वह तो एक है। कृष्णकांत कहते हैं- आप भी बनारस जा रहे हैं? तो सतीश कहते हैं - सूरत..अभी तो मोक्ष (Salvation) के लिए बहुत टाइम है। पूरे रास्ते सतीश खाते और बातें ही करते है और एक कहावत कहते है-" सूरत में खाना खाओ और काशी में मोक्ष पाओ" कृष्णकांत उसे बड़े गंभीर आश्चर्य से देखते ...

मिशन मंगल फ़िल्म समीक्षा -Mission Mangal movie Review

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 मिशन मंगल फ़िल्म समीक्षा -Mission Mangal movie Review  तार्किक और वैज्ञानिक (यहां  कहने का मतलब यह है कि इसमें किसी प्रकार का  फ़ूहड़ और बेहूदा या अश्लील हास्य का प्रयास नहीं है) मनोरंजक फिल्म है। किरदारों का एक एक करके मनोरंजक आगमन का  दृश्य हो, मिशन में व्यवधान के बाद उनकी प्रतिक्रिया हो, उनके काम करने का तरीका हो या व्यक्तिगत जिंदगी हो। पात्र अंत तक वैसे ही निर्वाह किए गए हैं। निर्देशक जगन शक्ति और Creative( रचनात्मक) निर्देशक आर. बाल्की  ने एक एक संवाद यूं कहें एक एक शब्द पर काम किया है। एक भी शब्द व्यर्थ नहीं लगता। जैसे- संजय कपूर का पात्र पूछते हैं -"पैसा कहां भरना है" तो उनकी बेटी कहती है "स्टॉक मार्केट।'' ये दो शब्द उसके चिड़चिड़ेपन, निठल्लेपन,भड़ास के कारण को बखूबी बयां करते हैं ।अंत में मिशन के सफल होने के टीवी प्रसारण को वे बिजली कट जाने के कारण देख नहीं पाते। वर्षा पिल्लई (नित्या मेनन )के घर एडजस्टमेंट की बात हो या नेहा सिद्दिकी ( कृति कुल्हारी) का मकान मालिक से बातचीत का दृश्य या विद्या बालन का उसके सुपुत्र द्वारा ``its time to change the god''...

हाई डेफिनेशन हरामखोरी-लघु कहानी

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वो 12- 13 बरस की होगी। साँवली रंगत,टेरीकॉट की सलवार घुटने व कुहनियों पर सिकुड़ गए थे। दुपट्टा और झीना तौलिया सिर ढकने के लिए, और कमर में बंधी दो छोटी पोटलियां। हम जैसे प्रकृति से भयभीत लोग भरी जेठ में सुबह 8:00 बजे तक और शाम 6:30 के बाद ही घर से सब्जी आदि के लिए बाजार निकलते हैं। बाजार की सड़कें उत्तर से दक्षिण दिशा में लगभग समानांतर हैं। किसी रेसिंग ट्रैक की तरह और सभी यहां अनंत मैराथन में हैं। सड़क के दोनों किनारे छोटे-बड़े दुकान, ठेले-खोमचे; बीच-बीच में कुछ दुकान बनते घर। कुछ बचे-बचाए घर और एकाध दुर्लभ खंडहर । दुकान व सड़क के बीच दोनों ओर बास मारती नालियां कहीं ढकी, कहीं खुली हुई। सुबह उसे सड़क के पूर्व दिशा में ढकी नाली पर बड़े-बड़े HD TV,फ्रीज, कूलर, एसी, वाशिंग-मशीन, प्यूरीफायर आदि के इलेक्ट्रॉनिक्स दुकान के कोने में बैठे देखता और शाम को सड़क के पश्चिमी किनारे खंडहरनुमा मकान के सामने खुली नाली पर पटरा (लकड़ी की चौड़ी पट्टी) बिछा कर बैठे देखता, सब्जी सड़क पर होती। निगम को फुर्सत कहां कि वो नालियों को ढक दे! उसे शहर की बर्बादी का कोई गम नहीं, नि-गम जो है।  यह काम दुकानदार और रहवासियों का थ...

SHERSHAAH Movie Review शेरशाह फिल्म समीक्षा

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  “अपने देश से बड़ा कोई धर्म नहीं होता” शेरशाह फिल्म का यह अंतिम संवाद ही परमवीर चक्र कैप्टन विक्रम बत्रा के जीवन का मूल मंत्र रहा है। इस संवाद के बाद कैप्टन बत्रा का वास्तविक साक्षात्कार (interview) भी दिखाया गया है,जिसमें वे भारत माता के सबसे खुशमिजाज, सबसे जांबाज, दुश्मनों को विकट युद्ध परिस्थिति में हंसकर चुनौती देने व स्वीकारने वाले शेर दिखते हैं। शेरशाह कैप्टन बत्रा को 1999 के कारगिल युद्ध में दिए गए ऑपरेशन (सैन्य धावा) का कूट(Code) नाम था। 25 वर्षीय अमर शहीद परमवीर कैप्टन बत्रा जैसे योद्धाओं के लिए ही 12वीं शताब्दी में वीरगाथा कालीन कवि जगनिक ने परमाल रासो के आल्हा खंड में लिखा है – “बारह बरिस(वर्ष) ले कुकर (कुत्ता) जिऐं,  औ तेरह लै जिऐं सियार, बरिस अठारह छत्री (योद्धा) जिऐं, आगे जीवन को धिक्कार”  यहां पर छत्री(क्षत्रिय) का अर्थ रणबांकुरों,योद्धाओं,सैनिकों से है। आधुनिक काल में भारत के सनातन समाज को जाति के नाम पर भड़काने वाले इस देश के दुश्मन समझ लें कि-निसंदेह एक कालखंड में भारत में कर्म आधारित व्यवस्था जन्म आधारित होकर घृणित हो गई थी और कई समुदायों के साथ अन्या...